अठन्नी और चवन्नी
अठन्नी और चवन्नी
दो भाई थे। चवन्नी और अठन्नी। जैसा की नाम से ही मालूम हो जाता है की चवन्नी छोटा और अठन्नी बड़ा था। दोनों के बीच बहुत प्रेम था। साथ विद्यालय जाते , साथ खेलते कूदते , साथ पढ़ते , अठन्नी चवन्नी को पढ़ता , बहुत लाड ,उसकी बहुत देखभाल करता था करता था। माता -पिता अपने को धन्य समझते की दोनों भाइयों में राम -लक्समन सा प्रेम है। पड़ोसी ,रिश्तेदार अपने बच्चों को उनका उदहारण देकर समझाते की 'उन जैसा बनो , मिल-बाँट कर रहो।
एक दिन घर पर सूखी लकड़ियां ख़तम हो गयी और पिताजी घर पर नहीं थे तो माँ ने अठन्नी को बोलकर लेने भेजा। अठन्नी ,चवन्नी को साथ लेकर गाँव के चौराहे पर जो आम का पेड़ है वहां पहुँच गया। वहां उन्होंने देखा की आम की सूखी मोटी दाल आंधी से टूटकर नीचे गिरी हुई है।
अठन्नी : लकड़ी तो मिल गयी छोटे , पर हम दोनों इसे लेकर कैसे जा पाएंगे। आखिर हैं तो हम बालक ही।
चवन्नी: पर भैया अगर इसे छोड़कर चले गए तो कोई दूसरा इसे उठाकर ले जायेगा।
बड़ी दुविधा थी । अठन्नी ग्यारह वर्ष का था और चवन्नी आठ वर्ष का। इतनी बड़ी लकड़ी को उठाने का वो सोच भी नहीं सकते थे। इतने में चवन्नी ने देखा की दाल के नीचे आने से एक मोटा सफ़ेद कीड़ा मरा हुआ पड़ा हैं ,जिसे बहुत सी चींटियां उठाये लिए जा रही है।
चवन्नी जोर से चिल्लाया "भैया !देखो यह क्या है ?
अठन्नी : ये तो चित्तियाँ कीड़े को ले जा रही है।
चवन्नी : इतनी छोटी चित्तियाँ इतने बड़े कीड़े को कैसे उठाकर ले जा पा रही हैं ?
अठन्नी : देखो तो कितनी सारी चींटियां है, यह सब मिलकर इसे उठा रही है। अरे छोटे ! यह तो कुछ भी नहीं बहुत -सी चीटियां मिलकर तो मरे हुए सांप को भी घसीट कर ले जाती है।
चींटियां कीड़े को उठाकर ले जा रही थी। कीड़ा बहुत बड़ा था तो बार बार लुढ़क जाता था। कभी -कभी दस -पांच चींटियां उसके नीचे दब भी जाती थी। लेकिन दूसरी चीटियां झट उस कीड़े को हिलाकर दबी हुई चींटियों को निकाल लेती थी। काली काली -छोटी चींटियां थकने का नाम ही नहीं ले रही थी।
अठन्नी ,छावनी एकटक उन पर नज़रें टिका, बिना पलके झपकाएं उन्हें देखते रहे और उनके देखते -देखते चींटियां ,कीड़े को सरकाते हुए बहुत दूर निकल गई।
चवन्नी यह देखकर बहुत खुश हो गया और ताली बजाते हुए कूदने लगा। फिर वह आम की टूटी हुई डाली पर बैठ गया और अठन्नी को बोला "भैया !मुझे ज्यादा तो नहीं पता पर इन चिट्ठियों से ज्यादा शारीरिक बल तो है हम दोनों में। उसकी बात सुनकर अठन्नी को भी जोश आ गया और वे डाली को उठाने का प्रयत्न करने लगे। उन्हें ऐसा करते देख उनके अन्य मित्र भी उनकी सहायता करने आ पहुंचे। सबने मिलकर उस डाल को लुढ़काना और ठेलना प्रारम्भ किया।
"दम लगाके हैय्या ,जोर लगाकर हैय्या " कहते सभी आगे बढ़े और सभी ने डाली मिलकर अठन्नी ,चवन्नी के घर पहुंचा दी।
गर्मी के दिन थे तो माँ ने सभी बच्चों को कैरी की छाछ पिलाई और उन्हें अनेकता में एकता से नेकता की सीख देते हुए कहा " आज की तरह तुम लोग कठिन से कठिन काम भी मिलकर पूरा कर सकते हो। मिलकर रहोगे तो कोई तुम्हें हानि नहीं पहुंचा सकेगा और सभी कार्य तुम्हारे सरलता से पूरे हो जायेंगे।
