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अन्तर्द्वन्द

अन्तर्द्वन्द

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मित्रों इस कहानी में आपको एक अन्तर्द्वन्द की झलख दिखेगी।कभी-कभी जीवन में आपके पास चुनाव का एक ही अवसर होता है या होता भी है तो आप परिस्थितिवश उसका चुनाव करने में सक्षम नहीं होते हैं।

इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि उस समय आप अर्जुन होते हैं और आपको एक श्रीकृष्ण की आवश्यकता होती है उस परिस्थिति से स्वयं को निकालने के लिए, संभवतः इसी प्रकार के भँवर में फँसी हुई थी कांँचनी । आखिर क्या हुआ था उसके साथ, क्या करना था उसे ?किस प्रकार की अग्नि परीक्षा से गुजरना था उसे ? क्या वो इस भँवर से निकल पाई।इसके विषय में जानने के लिए आइये आपकी भेंट कांँचनी से कराता हूँ।कांचनी अर्थात् कंचन समान।

कांचनी वकालत की विद्यार्थी थी, वह इस विभाग के प्रभाग में साईबर लाॅ की विद्यार्थी थी।वह इस विभाग में अध्ययन कार्य करते हुए एक से एक कीर्तिमान स्थापित करती जा रही थी।

पाठकों आप सभी जानते होंगे कि वकालत की पढ़ाई इतनी सरलतम नहीं होती है, इसे एक तपस्या की भाँति ही सम्पन्न करनी होती है।इसके लिए आपको दो बार स्नातक करना पड़ता है, एक तो महाविद्यालय में रहने के समय लिए गए विषय से तो करनी ही होती है और दूसरा

वकालत में स्नातक करनी होती है, इसमें भी आपको वकालत में प्रतिष्ठा करने की आवश्यकता होती है।

यह जानकारी मेरे अपने विचार से शायद ऐसा ही होता है, परन्तु आधुनिक समय में इसके नियम में कुछ परिवर्तन किए गए हैं, यथा इसे दो वर्ष से बढ़ाकर पाँच

वर्ष किया गया है सम्भवतः, साथ में इसकी मानक डिग्री तब तक प्राप्त नहीं होती।जबतक आप किसी वरिष्ठ अधिवक्ता के छत्रछाया में दो वर्ष सम्भवतः काम नहीं कर लेते(अथात् कुल पाँच में तीन वर्ष का पाठ्यक्रम तथा दो वर्ष का इन्टर्नशिप यानि कि वरिष्ठ अधिवक्ता की छत्रछाया में अनुभव प्राप्त करना)।अब पाठक सम्भवतः समझ सक पा रहे होंगे कि इस पाठ्यक्रम को मैंने तपस्या की संज्ञा क्यों दी है और उस पर साईबर लाॅ के विद्यार्थी के लिए प्रतिभा के साथ अन्तर्जालिका(internet) की दक्षता का होना अति अनिवार्य है, तब जाकर आप साईबर लाॅ के विशेषज्ञ कहे जा सकते हैं।

पाठकों ये तो थी इस विषय विशेष से सम्बन्धित कुछ जानकारी, आइये अब अपनी कहानी की ओर चलते हैं।

काँचनी ने इस विभाग के अन्तर्गत बहुत ही कम समय में अपना आधिपत्य(अधिकार)कर लिया था।वो इस विधान में पारंगत होती जा रही थी।काँचनी अपने गाँव से शहर अपने इस विशेष अभिरूचि को पूर्ण करने आई थी ।उसके गाँव जो लखनऊ शहर से पचास किलोमीटर दूर जाकर बसा हुआ था, वहाँ से उसने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई पूर्ण की जो एक संघर्ष से कमतर नहीं था।

फिर भी इन सारी परेशानियों का सामना करते हुए काँचनी आगे की ओर द्रुतगति से बढ़ती जा रही थी, वो इस प्रकार आगे की ओर बढ़ती जा रही थी कि मानो आज ही सम्पूर्ण किला उसे फतह कर लेनी हो और यह देखा भी गया है कि कमल कीचड़ में ही खिला करते हैं, यह तथ्य सम्भवतः काँचनी के जीवनगाथा को संतुष्ट कर रही थी।

काँचनी ने प्रारंभिक शिक्षा तो यहाँ हासिल कर ली, परन्तु उसे अपनी इस विशेष अभिरूचि को पूर्णतः सम्पन्न करने के लिए अमेरिका का रूख करना पड़ा।

वह अपने स्काॅलरशिप के प्रभाव व उत्तर प्रदेश सरकार की सहायता से अमेरिका तक पहुँच ही गयी। पाठकों मैं यहाँ बता दूँ कि अमेरिका जाकर अपना यह विशेष पाठ्यक्रम पूर्ण करना काँचनी के लिए सरलतम कार्य नहीं था, एक तो वह भारतीय थी और उसने भारत से बाहर कभी पाँव भी नहीं रखा था, पर इस प्रकार कहा भी गया है न कि जहाँ चाह, वहाँ राह !(where there is a will, there is a way) तो काँचनी ने भी इस सिद्धान्त का अनुपालन किया और वह बहुत ही अल्प समय में साईबर लाॅ की एक अनुभवी अधिवक्ता बन गयी और अमेरिका में ही वहाँ के न्याय शाखा के अन्तर्गत कार्य करने लगी ।मैं यहाँ पुनः स्पष्ट कर दूँ कि वो उत्तर प्रदेश में भी इस कार्य को कर सकती थी, परन्तु अभी भी हमारे यहाँ तकनीक से सम्बन्धित बहुत सारी विशेष उपकरणों का अभाव है, इसके लिए इसमें विभिन्न प्रकार के उपकरणों की आवश्यकता होती है, यथा लाई डिटेक्टर, हैकिंग मास्टर साॅफ्टवेयर(पायथन), होलोग्रामिक इमेज कन्वर्टर, साईबर अपराध नियन्त्रक विशेष अत्याधुनिक उपकरण, विशिष्ट कैमरा इत्यादि।मित्रों जब इनके नाम ही जब इतने भारी भरकम हैं तो इसका तो अतिविशिष्ट प्रशिक्षण भी अवश्यमभावी होगा।

मैं यह बता दूँ कि अपने भारत देश में विशेषकर हैकिंग साॅप्टवेयर की विशेष जानकारी प्रदान करना कानूनन अपराध समझा जाता है, परन्तु इसके अभाव में कभी-कभी पीड़ित को उचित न्याय नहीं मिल पाता।

खैर पुनः कहानी का रूख किया जाए चूँकि काँचनी अमेरिका में इस विशेष पाठ्यक्रम को पूर्ण कर रही थी, इसलिए उसे इन विशिष्ट उपकरणों को बारीकी से देखने और समझने का सुअवसर मिला हुआ था ।

काँचनी ने लाई डिटेक्टर क्या है, किस भाँति काम करता है इत्यादि की जानकारी प्राप्त कर ली थी।उसे होलोग्रामिक इमेज क्रियेटर मशीन की जानकारी प्राप्त हो गयी थी, साथ ही उसने हैकिंग साॅफ्टवेयर पायथन इत्यादि की भी जानकारी कर रखी थी।

यदि इसे सरल अर्थों में समझा जाय तो उसे साईबर अपराध नियन्त्रक विशेष प्रत्येक अत्याधुनिक उपकरणों इत्यादि की जानकारी हो गयी थी।

पर इन सारी जानकारियों के बाद भी वो एक दिन फँस ही गयी एक ऐसे भँवर में जिससे निकल पाना बड़ा ही मुश्किल हो रहा था उसके लिए, क्योंकि इस बार हमारी वकील साहिबा को एक ऐसे केश का जि़रह(बहस) करना था जिसमें पक्ष और विपक्ष दोनों ही उसके अपने थे, इसलिए तो मैंने ऊपर लिखा है कि वह ऐसी भँवर में फँसी हुई थी।

जिससे पार पाना उसके लिए मुश्किल हो रहा था।

ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह अर्जुन हो और उसके सामने वाला विपक्ष कौरव हो और उसके पीछे का पक्ष पाण्डव हो, परन्तु अन्तर यहाँ यह था कि उसकी सहायता के लिए साक्षात श्रीकृष्ण तो नहीं थे।परन्तु साईबर लाॅ के अन्तर्गत जो उसने सीखा, पढ़ा और समझा था उन्ही उपकरणों को उसे श्रीकृष्ण की कृपा समझकर दोनों पक्ष को इस महाभारत से निकालना था ।

दूसरे अर्थ में यदि कहा जाय तो इस अन्तर्द्वन्द से स्वयं को उसे निकालना था क्योंकि जब अपने लोग आपके सामने अपराधी और न्याय के अभिलाषी बनकर सामने होते हैं तो एक कुशल वकील होने के बावजूद भी आप सरलता से निष्कर्ष तक कभी नहीं पहुँच सकते और जब अपराध साईबर से सम्बन्धित हो तो निष्कर्ष तक पहुँचना मुश्किल से मुश्किलतर हो जाता है।

पाठकों आप सबों को यह भली-भाँति ज्ञात होगा कि अन्तर्जालिका(इन्टरनेट)एक सुविधाजनक तकनीक के रूप में यदि हमारी सहायता कर रहा है तो इसके कुछ जानकार इसका गलत फायदा भी उठाने में बाज नहीं आते।

आज मात्र भारत का ही एक आंकड़ा यदि एकत्र किया जाए तो साईबर से सम्बन्धित लगभग 100%में से 70% केस साईबर अपराध के होते हैं, जिनमें लगभग 5%फिशिंग, 7-10% हैकिंग व लगभग 30-45% अशलील विडियो बनाने से सम्बन्धित होता है और इसका मूल कारण होता है इन्टरनेट पर धड़ल्ले से चलने वाले कुछ वेबसाईट्स, जिसके लिए न किसी विशेष आदेश व सुरक्षा की आवश्यकता होती है।

इसी वरदानरूपी अभिशाप के कारण आज भारत देश में कई महिलाओं व यहाँ तक किशोरियों को समाज में अपने अपमान के भय से आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध का सहारा लेना होता है जो हमारे लिए गर्व की नहीं शर्म की बात है और इसका मूल कारण है हमारी इस विषय विशेष में अज्ञानता।

आज हम जिस समाज में रह रहे हैं वहाँ, हमें एक चीज सीखाई, पढ़ाई गयी है कि बुरा न देखो, न सुनो ।इसी गूढ़ ज्ञान के कारण हम जब किसी अपने को इस अभिशाप के पीड़ित के रूप में देखते हैं तो इस झूठे अभिमान के बोझ तले उसका साथ न देकर उस पर ही लांछन लगाना प्रारम्भ कर देते हैं कि तुम्हारी ही गलती थी, अमुक कुकर्म तुमने ही किया होगा इत्यादि और वो बेचारी समझ नहीं पाती, इस दंश को झेल नहीं सकती और वो आत्महत्या का सहारा लेकर अपने जीवन को हम पढ़े-लिखे लोगों की पढ़ी-लिखी समझ की भेंट चढ़ा अपनी इहलीला(जीवन) ही समाप्त कर जाती है।

इस इन्टरनेट रूपी वरदानअभिशाप के विशेषज्ञों ने एक नया तरीका जो आजकल देख पा रहा हूँ इसके दुष्प्रभाव से हमें जकड़ने के लिए इजात कर लिया है कि मैं इन दिनों जब आज मैं कहानी लिख रहा हूँ तभी ही आज एक प्रचलित वेबसाईट पर ही जैसा देख पाया कि कुछ देर के लिए यह कुछ रहती है और कुछ देर के बाद यह कुछ और ही हो जाती है।

खैर चलिए पुनः कहानी में लौटा जाए कांचनी को एक ऐसे केस को आज लड़ना था जिसमें अपराधी उसका अपने ही एक रिश्तेदार का लड़का था जिस पर पुलिस ने

मर्डर का, और दुष्कर्म का चार्ज लगाया था क्योंकि सारे सुबूत और गवाह उसकी ओर ही इशारा कर रहे थे, मिला-जुलाकर बहुमत (मेजोरिटी) उसके विपक्ष में थी और पीड़िता का परिवार उसके मामा के घर से था और जिसकी हत्या दुष्कर्म के बाद की गयी थी वो कांचनी की अपनी ममेरी बहन थी और कांचनी इन दोनों के बीच में अभिमन्यु की भाँति इस चक्रव्यूह में फँसी हुई थी और इसमें अन्तर्द्वन्द से उसका निकलना बड़ा मुश्किल हो रहा था पर उसने सूझ-बुझ के साथ तमाम सुबूतों और विडियो फूटेज को अपनी पारखी नजर और अपने अनुभव से देखा, जाना और समझा। पूरी गहराई से सुबूतों का अध्ययन करने के बाद कांचनी इस निष्कर्ष पर पहुँच पाई कि पीड़िता के साथ उस अपराध को करने व उसकी हत्या करनेवाला उसके रिश्तेदार का लड़का नहीं, कोई अन्य है और उसका 3-डाईमेंशनल होलोग्रामिक इमेज किसी ने चुपके से तब तैयार किया जब वह नीचे गिरी हुई पीड़िता को उठाने के लिए झूका और पास में पड़े रस्से में उसका पैर फँस गया और चूँकि वह लड़का पीड़िता का एक अच्छा दोस्त था इसलिए उसके गिरने की आवाज सुनकर उसे उठाने के लिए जब दौड़ा वह ब्रेड पर मक्खन चढ़ा रहा था और दुर्घटनावश ही सही उसकी चाकू पीड़िता को लग गयी, और वह डर के कारण वहाँ से भाग गया तबतक पीड़िता सम्भवतः जीवित थी, मगर पीछे कोने में पहले से छिपे असली अपराधी ने निकलकर उस अपराध को अंजाम दिया और बढ़ी ही सफाई से वो वहाँ से निकल भी गया।काँचनी ने जब यह दलील अदालत के समक्ष रखी तो वहाँ उपस्थित दोनों पक्ष के लोग और पूरी अदालत उसकी कुशल सुझ-बूझ की प्रशन्सा करने से अपने आप को रोक न पाए और इस प्रकार कांचनी ने बहुमत की आवाज को ध्यान में न रखते हुए पीड़िता को अपने दिमाग के बलबूते उचित न्याय दिलाया, साथ ही अपने अन्दर उठे द्वन्द (अन्तर्द्वन्द) को भी समाप्त कर लिया।


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