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Anand Mishra

Action

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Anand Mishra

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अंतिम उपनिवेश

अंतिम उपनिवेश

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 वर्ष 2248

मानवता अब केवल पृथ्वी की सभ्यता नहीं रही थी।

चन्द्रमा, मंगल, टाइटन और अनेक क्षुद्रग्रहों पर भारतीय सहित विभिन्न मानव उपनिवेश बस चुके थे।

लेकिन सौरमंडल के बाहरी क्षेत्र में एक ऐसा ग्रह था जहाँ जाने का साहस कोई नहीं करता था।

उसका नाम था—

प्रज्ञा-९।

सौ वर्ष पहले वहाँ एक अनुसंधान उपनिवेश स्थापित किया गया था।

फिर अचानक सम्पर्क टूट गया।

उसके बाद वहाँ भेजा गया हर अभियान या तो लौटकर नहीं आया...

या केवल एक संदेश भेज सका—

"कुछ मत खोजो।"

इन घटनाओं के बाद प्रज्ञा-९ को निषिद्ध क्षेत्र घोषित कर दिया गया।

वर्ष 2248

भारतीय अंतरग्रहीय पुरातत्व मिशन की प्रमुख—

डॉ. ईरा वशिष्ठ

को एक विचित्र संकेत मिला।

वह संकेत उसी खोए हुए उपनिवेश से आ रहा था।

लेकिन संदेश नया था।

"यदि यह संदेश मिल रहा है...
 तो हम असफल नहीं हुए।"

ईरा ने एक छोटा अभियान बनाया।

दल में पाँच लोग थे।

कमांडर कबीर नायर – अभियान प्रमुख।डॉ. ईरा – अंतरिक्ष पुरातत्व विशेषज्ञ।यश – रोबोटिक्स अभियंता।तारा – भाषाविद्।वेद – जैव-परिस्थितिकी विशेषज्ञ।

उनका अंतरिक्षयान प्रज्ञा-९ पर उतरा।

पूरा उपनिवेश खाली था।

इमारतें सुरक्षित थीं।

ऊर्जा प्रणाली अब भी चल रही थी।

भोजन भंडार भी लगभग भरे थे।

लेकिन...

एक भी मनुष्य नहीं था।

मुख्य नियंत्रण कक्ष में केवल एक पंक्ति लिखी थी—

"सीमा पार मत करना।"

ग्रह का मानचित्र देखा गया।

उपनिवेश के बाहर लाल रंग की एक विशाल वृत्ताकार सीमा चिन्हित थी।

कबीर ने कहा—

"हम नियम नहीं जानते।"

"अतः पहले उसका सम्मान करेंगे।"

तीन दिन तक दल ने केवल उपनिवेश का अध्ययन किया।

ईरा को एक पुराना वीडियो मिला।

पहले उपनिवेश के प्रमुख वैज्ञानिक कह रहे थे—

"हमने यहाँ एक असाधारण जैविक चेतना खोजी है।"

"यह किसी एक जीव में नहीं रहती।"

"पूरा वन..."

"...एक ही जीव है।"

यदि कोई सीमा के भीतर प्रवेश करता...

तो पूरा पारिस्थितिक तंत्र एक साथ प्रतिक्रिया करता।

वह हमला नहीं करता।

वह केवल बाहरी वस्तु को अपने भीतर समाहित करने का प्रयास करता।

इसी कारण पूरा पहला उपनिवेश धीरे-धीरे उस जैविक चेतना का भाग बन गया।

वे मरे नहीं थे।

वे...

अलग भी नहीं रहे थे।

तारा ने कहा—

"तो उन्होंने अंतिम संदेश क्यों भेजा?"

ईरा ने उत्तर दिया—

"शायद इसलिए कि कोई उनकी भूल दोहराए नहीं।"

इसी बीच पृथ्वी से एक निजी खनन निगम का जहाज़ आ पहुँचा।

उन्हें ग्रह के भीतर छिपे दुर्लभ जैविक खनिज चाहिए थे।

ईरा ने चेतावनी दी।

उन्होंने हँसकर कहा—

"यह केवल अंधविश्वास है।"

उन्होंने सीमा पार कर दी।

कुछ ही मिनटों में पूरा वन जीवित हो उठा।

पेड़।

लताएँ।

भूमि।

सूक्ष्मजीव।

सब एक साथ सक्रिय हो गए।

खनन मशीनें रुक गईं।

संचार बंद हो गया।

दल के सदस्य दिशाभ्रम का शिकार होने लगे।

ईरा ने लड़ाई नहीं चुनी।

उन्होंने पहले उपनिवेश के अभिलेखों में एक और तथ्य खोजा।

वह चेतना ध्वनि से नहीं...

लय से संवाद करती थी।

उन्होंने उपनिवेश की पुरानी जैविक आवृत्ति प्रणाली सक्रिय की।

धीरे-धीरे वन शांत होने लगा।

कुछ देर बाद...

धरती पर पहली बार एक गैर-मानवीय चेतना का संदेश दर्ज हुआ—

"हम सीमा इसलिए बनाते हैं...
 क्योंकि अस्तित्व का सम्मान वहीं से शुरू होता है।"

खनन निगम ने अपना अभियान रद्द कर दिया।

ईरा और उनकी टीम पृथ्वी लौट आए।

वे कोई खनिज नहीं लाए।

कोई नई तकनीक भी नहीं।

वे केवल एक नया सिद्धांत लेकर लौटे—

"हर खोज, अधिकार नहीं देती।"

अंतरग्रहीय अन्वेषण परिषद – अभियान अभिलेख

प्रज्ञा-९ मिशन

"हमने एक नए ग्रह पर विजय प्राप्त नहीं की।

हमने उससे अनुमति माँगना सीखा।

शायद यही वह दिन था जब मानवता ने पहली बार अंतरिक्ष का उपनिवेश बनाना नहीं...

उसका पड़ोसी बनना शुरू किया।"



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