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Anand Mishra

Action

4  

Anand Mishra

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आख़िरी बही-खाता

आख़िरी बही-खाता

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लाल कपड़े में बंधी विरासत

बाज़ार में सुबह की चहल-पहल शुरू हो चुकी थी।

सब्ज़ीवालों की आवाज़ें, चाय की दुकान से उठती भाप, दूधवालों की साइकिलों की घंटियाँ और दुकानों के खुलते शटर—हर दिन की तरह आज भी कस्बा अपनी लय में जाग रहा था।

मुख्य बाज़ार के बीचोंबीच एक पुरानी दुकान थी—"मिश्रा ट्रेडर्स"

दुकान बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन कस्बे में उसका नाम सम्मान से लिया जाता था।

कोई कहता—"अगर ईमानदार सौदा चाहिए तो मिश्रा ट्रेडर्स जाओ।"

कोई कहता—"उस दुकान ने तीन पीढ़ियों को रोजगार दिया है।"

और कुछ बुज़ुर्ग तो मज़ाक में कहते—

"बाज़ार बदल गया, सरकारें बदल गईं, लेकिन मिश्रा ट्रेडर्स वहीं की वहीं है।"

दुकान के वर्तमान मालिक थे सत्तर वर्षीय हरिनारायण मिश्रा

सफेद बाल, शांत चेहरा और आँखों में एक ऐसी स्थिरता, जो लंबे अनुभव के बाद ही आती है।

हर सुबह दुकान का शटर खुलने से पहले वे भीतर जाकर एक पुरानी लकड़ी की अलमारी के सामने कुछ क्षण खड़े रहते।

अलमारी के सबसे ऊपर वाले खाने में लाल कपड़े में लिपटी एक मोटी बही रखी थी।

वे उसे देखते, हाथ जोड़ते और फिर दिन का काम शुरू करते।

कई लोगों ने यह दृश्य देखा था।

लेकिन किसी ने कभी पूछने की हिम्मत नहीं की।

सिवाय उनके पोते अर्जुन के।

अर्जुन शहर से पढ़ाई पूरी करके लौटा था।

उसने प्रबंधन में डिग्री ली थी।

नई तकनीक, आधुनिक व्यापार और डिजिटल व्यवस्था पर उसका पूरा विश्वास था।

उसे लगता था कि पुराने तरीकों से चिपके रहना प्रगति में बाधा है।

एक दिन उसने दादाजी से पूछा—

"दादाजी, आप रोज़ उस पुरानी बही को प्रणाम क्यों करते हैं?"

हरिनारायण मुस्कुराए।

"क्योंकि वह केवल बही नहीं है।"

"तो क्या है?"

"समय आने पर पता चल जाएगा।"

अर्जुन को यह उत्तर बिल्कुल पसंद नहीं आया।

उसे पहेलियाँ पसंद नहीं थीं।

वह स्पष्ट जवाबों का आदमी था।

कुछ महीने बाद उसने दुकान के आधुनिकीकरण का प्रस्ताव रखा।

नई अलमारियाँ।

कम्प्यूटर आधारित स्टॉक प्रबंधन।

डिजिटल रिकॉर्ड।

नया फर्नीचर।

सीसीटीवी।

ऑनलाइन ऑर्डरिंग सिस्टम।

परिवार के सभी सदस्य उत्साहित थे।

अर्जुन के पिता विनोद मिश्रा ने कहा—

"समय के साथ चलना ज़रूरी है।"

हरिनारायण ने भी विरोध नहीं किया।

उन्होंने केवल एक बात कही—

"जो नया लाना हो लाओ। लेकिन पुराना समझे बिना मत हटाना।"

नवीनीकरण शुरू हुआ।

दुकान के पिछले हिस्से से वर्षों पुराने कागज़ निकाले जाने लगे।

जंग लगे ताले खुले।

भूले हुए बक्से बाहर आए।

धूल से भरे रैक खाली किए गए।

काम तेजी से चल रहा था।

फिर मजदूर उस पुरानी अलमारी तक पहुँचे।

एक युवक सीढ़ी पर चढ़ा और ऊपर रखी लाल कपड़े वाली बही नीचे उतार लाया।

कपड़े पर धूल की मोटी परत जमी थी।

अर्जुन ने पहली बार उसे हाथ में लिया।

वह आश्चर्यचकित रह गया।

बही अपेक्षा से कहीं अधिक भारी थी।

"लगता है बहुत पुराने रिकॉर्ड हैं," उसने कहा।

"होंगे," मजदूर बोला।

अर्जुन ने कपड़ा हटाया।

नीचे चमड़े की जिल्द दिखाई दी।

समय ने उसके किनारों को घिस दिया था।

लेकिन वह अभी भी मजबूत थी।

पहला पन्ना खोला गया।

उसमें खरीद-बिक्री का लेखा था।

दूसरे पन्ने में उधार का हिसाब।

तीसरे में माल का विवरण।

सब कुछ सामान्य था।

अर्जुन मुस्कुराया।

"मैंने कहा था न, यह सिर्फ़ पुरानी अकाउंट बुक है।"

हरिनारायण कुछ नहीं बोले।

अर्जुन पन्ने पलटता गया।

फिर अचानक उसकी उँगलियाँ रुक गईं।

एक पूरा पन्ना खाली था।

बीच में केवल एक वाक्य लिखा था—

"यह वह वर्ष था जब बारिश हमारे कस्बे को भूल गई थी।"

"यह क्या है?" अर्जुन ने पूछा।

कोई उत्तर नहीं मिला।

उसने अगला पन्ना खोला।

उसमें नाम लिखे थे।

लेकिन उनके सामने रकम नहीं थी।

रामदयाल — अपने कुएँ का पानी सबके लिए खोला।

फातिमा बी — रोज़ दस परिवारों के लिए रोटियाँ बनाई।

श्यामलाल कुम्हार — बिना पैसे लिए घड़े बाँटे।

अर्जुन की भौंहें सिकुड़ गईं।

"दादाजी, यह व्यापारिक हिसाब नहीं है।"

हरिनारायण ने पहली बार मुस्कुराकर कहा—

"अब तुम सही दिशा में सोच रहे हो।"

उस रात अर्जुन बही घर ले आया।

मीरा भी उसके साथ बैठ गई।

मीरा इतिहास की अध्यापिका थी।

उसे पुरानी चीज़ों में हमेशा रुचि रहती थी।

रात के खाने के बाद दोनों भाई-बहन बही लेकर बैठ गए।

जैसे-जैसे वे पन्ने पलटते गए, उनकी उत्सुकता बढ़ती गई।

किसी पन्ने पर कस्बे में पहली पाठशाला खुलने का उल्लेख था।

किसी पर पहली बस सेवा शुरू होने का।

एक पन्ने पर लिखा था—

"आज पहली बार बिजली आई। बच्चों ने पूरी रात बल्ब को देखकर बिताई।"

मीरा हँस पड़ी।

"यह तो इतिहास की किताब है।"

अर्जुन ने सिर हिलाया।

"नहीं। इतिहास की किताब में बड़े लोग होते हैं। इसमें साधारण लोग हैं।"

तभी मीरा की नज़र एक नाम पर पड़ी।

गंगा।

कुछ पन्ने बाद वही नाम फिर दिखाई दिया।

"गंगा ने अनाज बाँटा।"

कुछ वर्षों बाद वाले पन्ने में—

"गंगा ने राहगीरों को भोजन कराया।"

फिर—

"गंगा ने बदले में कुछ नहीं लिया।"

मीरा ने पन्ना बंद कर दिया।

"यह गंगा कौन थी?"

अर्जुन ने कंधे उचकाए।

अगली सुबह दोनों ने यही प्रश्न हरिनारायण से पूछा।

बूढ़े व्यक्ति ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा।

कुछ क्षण तक चुप रहे।

फिर बोले—

"मैंने भी अपने पिता से यही पूछा था।"

"तो उन्होंने क्या बताया?"

"उन्होंने कहा था—जब समय आएगा, बही खुद बता देगी।"

"और क्या उसने बताया?"

हरिनारायण ने धीरे से सिर हिलाया।

"नहीं।"

अब अर्जुन और मीरा दोनों पूरी तरह उत्सुक हो चुके थे।

उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि यह केवल एक पुरानी बही नहीं थी।

इसमें कोई अधूरी कहानी छिपी थी।

एक ऐसी कहानी, जिसे पाँच पीढ़ियों ने संभालकर रखा था।

और उस कहानी के केंद्र में थी—

गंगा।

उस रात अर्जुन को देर तक नींद नहीं आई।

उसके मन में बार-बार वही प्रश्न घूमता रहा।

एक साधारण नाम।

एक साधारण महिला।

फिर भी पाँच पीढ़ियों से उसकी याद क्यों जीवित थी?

उसे नहीं पता था कि अगले कुछ सप्ताह उसके परिवार के इतिहास की सबसे बड़ी खोज में बदलने वाले थे।

और यह भी नहीं कि उस खोज में उसे अपने पूर्वजों के बारे में जितना पता चलेगा, उससे कहीं अधिक वह स्वयं अपने बारे में जानेगा।


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