अनकहा
अनकहा
पुणे
वर्ष 2036
आरव कपूर का जीवन बिल्कुल व्यवस्थित था—
अच्छी नौकरी।
बड़ा मित्र-वृत्त।
घूमना-फिरना।
नई-नई जान-पहचान।
वह किसी से दुश्मनी नहीं रखता था।
लेकिन किसी के साथ गहरा संबंध भी नहीं बनाता था।
उसका एक ही सिद्धांत था—
"बंधन जितने कम हों...
...जीवन उतना आसान रहता है।"
उसके मित्र उसे हँसी में "दिलफेंक" कहते थे।
आरव भी इसे मज़ाक समझकर टाल देता।
एक दिन उसकी कंपनी ने उसे छह महीने के लिए मैसूर स्थित नवाचार केंद्र भेजा।
वहाँ उसकी मुलाकात हुई—
नैना श्रीनिवासन से।
नैना एक उत्पाद डिज़ाइन अभियंता थीं।
शांत।
अनुशासित।
और अपने सिद्धांतों पर अडिग।
पहली ही मुलाकात में आरव ने सहजता से कहा—
"दोस्ती कर लेते हैं।"
नैना ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—
"दोस्ती माँगी नहीं जाती।
कमाई जाती है।"
आरव को पहली बार किसी ने इस तरह उत्तर दिया था।
उसे चुनौती अच्छी लगी।
लेकिन नैना प्रभावित नहीं हुई।
कुछ सप्ताह बाद दोनों एक परियोजना पर साथ काम करने लगे।
परियोजना थी—
दूरदराज़ ग्रामीण विद्यालयों के लिए कम लागत वाले डिजिटल शिक्षा उपकरण विकसित करना।
आरव जल्दी परिणाम चाहता था।
नैना बार-बार गाँवों में जाकर बच्चों और शिक्षकों की राय लेती।
आरव ने पूछा—
"इतना समय क्यों?"
नैना बोली—
"जिस समस्या को समझा नहीं...
उसका समाधान केवल अनुमान होता है।"
धीरे-धीरे आरव बदलने लगा।
पहली बार उसने किसी को प्रभावित करने के बजाय समझने का प्रयास किया।
कुछ महीनों बाद परियोजना सफल हुई।
आरव ने सोचा—
अब वह नैना से अपने मन की बात कह देगा।
लेकिन उसी दिन उसे पता चला कि नैना ने विदेश में शोधवृत्ति स्वीकार कर ली है।
उनकी उड़ान अगले सप्ताह थी।
आरव ने कहा—
"क्या तुम रुक नहीं सकती?"
नैना ने शांत स्वर में पूछा—
"यदि मैं रुक जाऊँ...
...तो क्या वह मेरे सपने का सम्मान होगा...
...या तुम्हारी इच्छा का?"
आरव के पास उत्तर नहीं था।
विदाई के दिन उसने नैना को एक उपहार दिया।
कोई महँगी वस्तु नहीं।
वह वही नोटबुक थी जिसमें परियोजना के दौरान दोनों ने अपने-अपने विचार लिखे थे।
पहले पृष्ठ पर आरव ने केवल एक पंक्ति लिखी थी—
**"पहले मैं लोगों से मिलने जाता था।
अब मैं उन्हें समझने की कोशिश करता हूँ।"**
नैना ने नोटबुक बंद की।
"यही सबसे बड़ा परिवर्तन है।"
वर्ष बीत गए।
दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में सफल हुए।
संपर्क बहुत कम रहा।
लेकिन सम्मान कभी कम नहीं हुआ।
ईमेल का एक अंश — पाँच वर्ष बादप्रेषक: नैना श्रीनिवासन
"आज हमारी ग्रामीण शिक्षा परियोजना को अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला।
मंच पर जब मुझसे पूछा गया कि इस परियोजना की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी, तो मैंने किसी तकनीक का नाम नहीं लिया।
मैंने कहा—
'सबसे बड़ी उपलब्धि वह दिन था जब हमारी टीम ने समाधान देने से पहले लोगों की बात सुनना सीखा।'
मुझे लगा, यह बात तुम्हें बतानी चाहिए।"
आरव ने ईमेल पढ़ा।
उन्होंने उत्तर लिखने की जल्दी नहीं की।
खिड़की के बाहर खेलते बच्चों को कुछ देर देखते रहे।
फिर मुस्कुराकर केवल एक पंक्ति लिखी—
**"कुछ लोग जीवन में हमेशा साथ नहीं चलते...
...लेकिन वे हमें ऐसा व्यक्ति बना जाते हैं जिसके साथ हम स्वयं जीवनभर चल सकें।"**
