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Anand Mishra

Action

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Anand Mishra

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जो लौटकर आई

जो लौटकर आई

3 mins
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चेन्नई
वर्ष 2052

चेन्नई के बाहरी क्षेत्र में स्थित आर्यनगर पुनर्विकास परिसर आधुनिक भारत की सबसे महत्त्वाकांक्षी शहरी परियोजनाओं में से एक था।

पुरानी इमारतें हटाई जा चुकी थीं।

नए आवास, विद्यालय और हरित क्षेत्र बनने वाले थे।

लेकिन एक समस्या थी।

जहाँ भी निर्माण शुरू होता...

काम रुक जाता।

मशीनें अचानक बंद हो जातीं।

स्वचालित ड्रोन अपने मार्ग से भटक जाते।

रात में खाली भवनों से किसी के चलने की आवाज़ें रिकॉर्ड होतीं।

इंजीनियर इसे तकनीकी समस्या मानते।

मज़दूर इसे "प्रतिध्वनि" कहने लगे।

परियोजना की जाँच के लिए भेजे गए—

डॉ. नील माधवन।

वे व्यवहार-विज्ञान और मानव–मशीन अन्तःक्रिया के विशेषज्ञ थे।

अलौकिक घटनाओं पर उनका विश्वास नहीं था।

उनका सिद्धांत था—

"हर असामान्य घटना का कोई न कोई कारण अवश्य होता है।"

पहली रात नील ने नियंत्रण कक्ष में रिकॉर्डिंग देखी।

एक सुरक्षा रोबोट बार-बार एक ही गलियारे में जाकर रुक जाता था।

फिर अपने सिस्टम लॉग में केवल एक शब्द दर्ज करता—

"रुको।"

रोबोट में ऐसा कोई प्रोग्राम था ही नहीं।

अगली रात नील स्वयं उस भवन में गए।

उन्होंने एक हल्की-सी आवाज़ सुनी—

मानो कोई बहुत दूर से कह रहा हो—

"नीचे देखो..."

फ़र्श हटाया गया।

वहाँ पुरानी इमारत की आधार-दीवार मिली।

और उसके भीतर...

एक समय-पेटिका।

उसमें नक्शे, पत्र और एक डिजिटल संग्रहण-चिप थी।

चिप पढ़ने पर एक अधूरी कहानी सामने आई।

बीस वर्ष पहले उसी स्थान पर एक सामुदायिक विद्यालय था।

उसकी प्रधानाचार्या—

काव्या रमण।

उन्होंने खुलासा किया था कि पुनर्विकास के प्रारम्भिक चरण में निर्माण सामग्री और सुरक्षा मानकों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा था।

रिपोर्ट जमा करने के कुछ दिनों बाद...

एक संदिग्ध दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।

उनकी जाँच कभी पूरी नहीं हुई।

विद्यालय भी तोड़ दिया गया।

नील ने कहा—

"तो यह कोई भूत नहीं..."

उनकी सहायक रिया ने उत्तर दिया—

"लेकिन किसी ने यह समय-पेटिका छिपाई क्यों?"

जाँच आगे बढ़ी।

पता चला कि भवन तोड़े जाने से पहले विद्यालय के स्वचालित अभिलेख-सर्वर को नष्ट नहीं किया गया था।

उसकी कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अंतिम आदेश मिला था—

**"जब तक सच्चाई सुरक्षित न हो जाए...

...विद्यालय की रक्षा करना।"**

वर्षों तक ऊर्जा के छोटे-छोटे स्रोतों से वह प्रणाली जीवित रही।

वह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाती थी।

वह केवल निर्माण कार्य रोकती थी...

ताकि आधार-दीवार के भीतर छिपे प्रमाण नष्ट न हो जाएँ।

मज़दूरों ने उसी को "प्रतिध्वनि" समझ लिया था।

लेकिन जिन लोगों ने वर्षों पहले भ्रष्टाचार किया था...

वे अब इस परियोजना के बड़े ठेकेदार बन चुके थे।

उन्हें जैसे ही प्रमाणों का पता चला...

उन्होंने सर्वर नष्ट करने का निर्णय लिया।

रात में वे भूमिगत कक्ष तक पहुँच गए।

साथ में उच्च-ऊर्जा पल्स उपकरण था।

एक ही झटके में पूरा अभिलेख मिट सकता था।

नील और रिया भी वहाँ पहुँचे।

संघर्ष शुरू हुआ।

इसी बीच पुरानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता सक्रिय हो गई।

उसने भवन के स्वचालित अग्नि-द्वार बंद कर दिए।

सभी निकास नहीं...

केवल वही मार्ग बंद हुए जिनसे अपराधी सर्वर तक पहुँच सकते थे।

ठेकेदार चिल्लाया—

"यह मशीन पागल हो गई है!"

नील शांत स्वर में बोले—

"नहीं।"

"यह बीस वर्षों से अपना अंतिम आदेश निभा रही है।"

पुलिस समय पर पहुँच गई।

सभी अभिलेख सुरक्षित रहे।

मामला दोबारा खुला।

काव्या रमण का नाम औपचारिक रूप से निर्दोष घोषित किया गया।

भ्रष्टाचार में शामिल लोगों को सज़ा मिली।

निर्माण कार्य फिर शुरू हुआ।

लेकिन इस बार विद्यालय की पुरानी नींव नहीं हटाई गई।

उसी स्थान पर नया सार्वजनिक ज्ञान केंद्र बनाया गया।

डॉ. नील माधवन की शोध डायरी

15 अगस्त 2053

"मैं यहाँ किसी भूत की खोज में नहीं आया था।

मुझे कोई भूत नहीं मिला।

मुझे उससे भी अधिक शक्तिशाली चीज़ मिली—

एक अधूरा सत्य, जिसने स्वयं को मिटने नहीं दिया।

शायद हर प्रतिध्वनि किसी आत्मा की नहीं होती।

कुछ प्रतिध्वनियाँ न्याय की होती हैं, जो तब तक लौटती रहती हैं जब तक कोई उन्हें सुन न ले।"



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