अनोखी वसीयत
अनोखी वसीयत
अन्तिम संस्कार करने के बाद आज तेरहवीं के साथ-साथ दान-पुण्य की प्रक्रिया पूरी कर, उसके बचे कपड़ों को भी दान में देकर किरणबाला के अस्तित्व को भी घर से विदा कर दिया गया। तभी वहां वकील आ पहुंचा वकील को देखकर सभी आश्चर्यचकित थे क्योंकि इकलौता बेटा होने के कारण घर की वसीयत पर उसका अधिकार था तो वसीयत लिखवाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता लेकिन वकील ने आकर वसीयत को पढ़ना शुरू किया तो सभी भौचक्के रह गए क्योंकि वसीयत में घर के बेटे या पोते का नाम ना होकर घर की पुत्रियों का नाम था और कारण भी उसमें स्पष्ट कर दिया गया था कि बहू जब से इस घर में आई है बहुत ज्यादा छुआछूत वाली और इन्फेक्शन को प्रधानता देने वाली है । वह घर में ना किसी के साथ रहना, खानाऔर बात करना पसंद करती बल्कि वह किसी कें छुए कपड़ों को पहनना भी पसंद नहीं करती है जबकि अन्य सभी घर के सदस्य एक दूसरे के साथ मिलजुल कर रहते हैं वह अपने आप को सबसे अलग-थलग रखती है। उसने कभी भी अपनों के साथ ही या अन्य के साथ प्रेम पूर्वक व्यवहार नहीं किया । उसके दिमाग में हमेशा यही ग्रंथि बनी रहती यदि उसके कपड़े को किसी ने एक बार पहन लिया तो वह उस को हाथ भी नहीं लगाती थी । इसी कारण वह विपत्ति में किसी के काम नहीं आ सकी।
वैसे तो वह हमेशा पुत्र के साथ बाहर ही रहती थी क्योंकि उसे सास-ससुर की परेशानियों का कोई एहसास ही नहीं था और ना ही वह परिवार के किसी सदस्य के साथ रहने के लिए तैयार थी या अच्छी बहू होने के नाते निभाने में विश्वास रखती थी । हां उसे अपने अधिकारों का बहुत अच्छी तरह से आभास था । बीमार हो जाने पर सास सेवा करे यह उसका फर्ज है। बहू के बच्चा हो तो सेवा करने और पोते- पोतियों को पालना सास का कर्तव्य है। सास बेचारी बहु को सँभालने के लिए दो बार विदेश गई तो भी सास को कोई भेंट देना उसका कर्तव्य नहीं बल्कि खानदान को वंश चिराग दिया है तो उसे उपहार देना सास-ससुर और नन्दों का कर्तव्य। अपने युवाकाल में सास- ससुर की न सरकारी नौकरी थी न कोई बड़ा बिजनेस। न ही उन्हें विरासत में कोई पैतृक सम्पत्ति मिली थी बल्कि तीन बहनों की शादी की जिम्मेदारी मिली। वो जिम्मेदारी निभाने में, अपने बच्चों को पढ़ाने- लिखाने में,और डेढ़ सौ गज का दो मंजिला मकान बनाने में ही जीवन चुकता हो गया। बहू को सास- ससुर से लेने का सिद्धांत तो रास आता था लेकिन देना उसे अपने हक का हनन लगता था। वो तो धन्य है छोटी बेटी जो बेटा बनकर खड़ी हो गई। आई टी क्षेत्र में प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर कार्यरत बेटी ने अपने भाई की जिम्मेदारियों को अपने कन्धों पर ले लिया।
जब वसीयत पढ़ी गई सब साँस रोककर बड़े ध्यान से सुन रहे थे। " मि.नरेन्द्रदेव व उनकी पत्नी अपने पूरे होश-ओ हवाश में अपनी सम्पत्ति जो केवल एक 150 गज में बने मकान के रूप में है अपनी संतान के मध्य इस प्रकार से बाँटते हैं। घर का तीन चौथाई हिस्सा छोटी बेटी और एक चौथाई हिस्सा बड़ी बेटी को देते है। सम्पत्ति में बेटे- बहू का भी हिस्सा था लेकिन बहू को किसी के द्वारा उपयोग की गई वस्तु को छूना भी पसंद नहीं है, क्योंकि इस घर में हमारी खुशबू रची बसी है। दर और दीवारों पर हमारी पहचान है, सारा जीवन इसी घर में व्यतीत किया है। अत: बहू- बेटे को मैं अपने द्वारा उपयोग किये मकान को देकर भी मैं शर्मिंदा नहीं करूँगा। मुझे यह कहते हुए तनिक भी अफसोस नहीं है कि मैं बेटे- बहू को अपनी सम्पत्ति से बेदखल करता हूँ।
