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गुॅंजन कमल

Drama Inspirational

4  

गुॅंजन कमल

Drama Inspirational

अनमोल पल

अनमोल पल

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सुनसान सड़क पर विजय शर्मा अपने आप में ही खोए चलें जा रहे थे। जब भी उनका मन दूसरों द्वारा दी जानी वाली पीड़ा पर व्यथित होता वें शांत हो जाते और चुपचाप अपने कमरे में बैठ कर आत्ममंथन में लग जाते लेकिन इस बार तो अपने ही खून ने ऐसी बातें कही थी कि आत्मा तक लहुलुहान हों गई थी।

जब उन्हें अपने ही कमरे में घुटन होने लगी तो वे सुनसान रास्तें पर निकल पड़े।

चलते-चलते वें सुनसान राह पर निकल आए थे लेकिन उनको सुध ही कहाॅं थी ? उनके कदम तो रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। आगे बढ़ते कदमों के साथ सरपट भागते हुए बीते दिनों की स्मृतियां उनके मानस पटल पर चलचित्र की भांति चलने

लगी थी।

' पापा ! मुझे साइकिल और लैपटॉप चाहिए। मेरे सभी दोस्तों के पास गियर वाली साइकिल और लैपटॉप है। वें सभी मुझे चिढ़ाते हैं और कहते हैं कि तुम्हारे पापा तो मामूली किसान है। उन्होंने हमारे पापा की देखा-देखी तुम्हारा एडमिशन उस स्कूल में तो करा दिया हैं जिसमें हम सब बड़े घर के बेटे-बेटियां पढ़ते हैं लेकिन वें तुम्हारे लिए गियर वाली साइकिल और लैपटॉप खरीद नही सकते क्योंकि तुम लोग गरीब हों और हमारी बराबरी कभी भी नहीं कर सकते।'     स्कूल से आते ही तेरह वर्षीय विक्की ने अपने स्कूल बैग को गुस्से में बिस्तर पर फेंका और रोते हुए अपने पापा विजय शर्मा से कहा।

' उन बच्चों ने तों बिल्कुल सही कहा कि मैं एक मामूली सा किसान हूॅं और मेरे पास इतने पैसे नहीं कि मैं तुम्हें साइकिल और लैपटॉप एक साथ खरीद कर दें सकूं।'              विजय शर्मा ने मुस्कुरा कर समझाते हुए अपने बेटे विक्की से कहा।

' जब आपके पास इतने पैसे नहीं कि मेरी जरूरतों को आप पूरी कर सकें तों मुझे इतने बड़े स्कूल में पढ़ाते क्यूं है ?  मुझे नहीं पढ़ना उस स्कूल में। सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं।'            विक्की यह कहकर जोर - जोर से रोने लगा।

' बेटा ! पैसे से कोई बड़ा - छोटा नहीं होता। वह तो हमारी सोच होती है जों हमें बड़े - छोटे का भेद बताती हैं और यह भेद तुम्हें उच्च शिक्षा ग्रहण कर ही मिटानी होंगी। उनके बीच रहकर ही तुम्हें शिक्षा और अपनी कुसाग्र बुद्धि द्वारा अपना स्थान बनाना होगा ना कि  गियर  वाली साइकिल और लैपटॉप को दिखाकर।'       विजय शर्मा ने अपने बेटे विक्की को चुप कराते हुए कहा।

विक्की ने अपने पिता से कुछ नहीं कहा और चुपचाप अपने कमरे में चला गया। विजय शर्मा को लगा कि उनका बेटा विक्की समझदार लड़का है , वह उनकी बात समझ गया है लेकिन उस दिन के बाद से विक्की तो अपने पिता से बात भी नहीं करता था। उसके पिता कुछ भी पूछते हाॅं .. हूं ... में जवाब देता और बहाने से निकल लेता।

जिस पिता की एकलौती संतान उससे बात ना करें और वह भी ऐसा पिता जों पिता होने के साथ-साथ माॅं का भी फर्ज आज तक निभाता आ रहा हों क्योंकि विक्की की माॅं तों उसे जन्म देने के साथ ही स्वर्ग - सिधार गई थी। गाॅंव वालों ने दूसरी शादी के लिए बहुत समझाया परन्तु एक पिता ने अपने बेटे की जिंदगी में सौतेली माॅं और उनके बच्चों द्वारा होने वाली तकलीफों को सोचकर अपनी खुशियों की कुर्बानी यह सोच कर दें दी थी कि उनका बेटा ही उनकी समस्त खुशी हैं। ऐसे पिता पर अपने बेटे के द्वारा किए जाने वाले व्यवहार से क्या बीत रही थी ? इसका एहसास विक्की को बिल्कुल भी नहीं था।

अपने बेटे की खुशी के लिए विजय शर्मा ने अपनी जमीन का वैसा टुकड़ा बेच दिया जिस पर वह खेती कर अपना और अपने बेटे का पेट पालता था। विक्की तों दोनों चीजें देखकर खुश हों रहा था लेकिन एक पिता के सामने यह समस्या आकर खड़ी थी कि विक्की की आगे की पढ़ाई और घर - खर्च कहाॅं से आएगा।

विजय शर्मा दिन में दूसरों किसानों के खेतों में मजदूरी करता और रात में चौकीदारी का काम करने लगा। वह अपने बेटे के स्कूल की फीस और खाने - पीने का इंतजाम किसी तरह कर रहा था। किसी-किसी दिन तों उसे पूरे दिन भूखा रहना पड़ता। वह खुद तो भूखा रह लेता लेकिन अपने बेटे को कभी भी भूखा नहीं सोने देता।

समय के साथ बेटा बड़ा हो रहा था और साथ ही उसकी जरूरतें भी लेकिन विजय शर्मा ने कभी भी अपने बेटे को अपने जैसा बनाने की नही सोची। उसके बेहतर भविष्य के लिए वह समय-समय पर कुर्बानी देता रहा।

कुर्बानी कभी व्यर्थ नहीं जाती। विजय शर्मा की सालों की कुर्बानी और बेटे की मेहनत ने रंग दिखाया और विक्की कृषि विभाग में अफसर बन गया। विजय शर्मा की खुशी का ठिकाना न रहा।

धीरे - धीरे समय के साथ पिता - बेटे की जिंदगी सुख से बीतने लगी। अग्रिम कुछ वर्षों में विजय शर्मा की जिंदगी में खुशियों के बेहतरीन पल आए। अब वह दादा बन चुके थे। पोते - पोतियों के साथ उनकी जिंदगी आराम और सुख से बीत रही थी कि अचानक एक दिन उनकी जिंदगी में भूचाल आ गया।

एक दिन विक्की ने अपनी पत्नी पर अपने पिता के सामने ही हाथ उठा दिया। ऐसा नहीं था कि उसने अपनी पत्नी पर पहली बार हाथ उठाया था। वह ऐसा अक्सर ही करता था लेकिन बंद दरवाजे के अंदर।

विजय शर्मा अधिकांश अपने कमरे में ही रहते थे यही कारण था कि अपनी बहू पर होते अत्याचार की भनक उनको नहीं थी। आज जब पहली बार उनके सामने यह अप्रत्याशित घटना घटी तो वह अपने आप को रोक नहीं पाएं और बेटे पर हाथ उठा दिया।

बेटे विक्की ने पत्नी और बच्चों के सामने अपना यह अपमान समझा और पिता से झगड़ने लगा। बातों ही बातों में उसने गुस्से में अपने पिता से कहा कि

" वह आज जिस मुकाम पर खड़ा है सिर्फ और सिर्फ अपनी मेहनत की बदौलत ही है।

विजय शर्मा को अपने बेटे की उस बात पर बहुत धक्का लगा जब उसने गुस्से में कहा कि " आपने मुझे मंहगे और बड़े स्कूल में इसलिए पढ़ाया ताकि आपका बुढ़ापा मेरे पैसों पर एशो-आराम से बीत सकें। आपने जितने भी कष्ट सहें उससे कई गुना आनंद और सुख आप मेरे पैसों पर पा रहे है।"

विजय शर्मा की बूढ़ी टांगें कब तक उनका साथ देती। वह धीमी होकर एक जगह खड़ी हो गई। अब बीती स्मृतियां मानस पटल से हट चुकी थी और सामने ऐसी राह थी जिसपर चलना विजय शर्मा के लिए मुश्किल लग रहा था। बेटे द्वारा कही बातों की चुभन दिल को इतनी लगी थी कि वह याद आते ही ऑंखो से गंगा - यमुना बहने लगी।

तेज धूप ऐसी थी कि अच्छे - खासे इंसान को बेचैन कर दें। सूरज से निकलती किरणों का प्रचंड ताप था और इस ताप ने विजय शर्मा को सड़क पर ही गिरा दिया होता अगर उन्हें पीछे से किसी ने पकड़ा ना होता।

विजय शर्मा की जब ऑंख खुली तो वह अपने बिस्तर पर थे। सामने बहू और बेटे विक्की का दोस्त रमन खड़ा था। बहू से मालूम चला कि रमन भैया अपनी कार से उस सड़क से गुजर रहें थे तभी उनकी नजर विजय शर्मा पर पड़ी थी। वह गिरने ही वालें थे कि रमन भैया ने उन्हें पकड़ लिया और घर ले आएं।

डाॅक्टर ने कहा कि विजय शर्मा का बी.पी लो हों गया था जिसके कारण उन्हें कमजोरी का एहसास हो रहा होगा। उनके द्वारा दी गई दवा और समय से खान-पान लेने से वह दो - तीन दिनों में बिल्कुल ठीक हों जाएंगे।

शरीर का कष्ट डाॅक्टर द्वारा दी गई दवा ठीक कर सकती हैं लेकिन आत्मा के दर्द को वह दवा ठीक कर पाती। विजय शर्मा अब पहले की भांति हॅंसना - बोलना भूल चुके थे।

अब वह गाॅंव में रहकर अनाथ बच्चों को पढ़ाते - लिखाते है जिसमें उनकी मदद उनकी बहू करती है। अब उनकी बहू की भी सरकारी नौकरी है और वह भी आत्मनिर्भर हो चुकी है। गुप्त दान के नाम पर वह अपनी सारी तनख्वाह गाॅंव में रह रहे अपने ससुर को भेज देती है जिसकी जानकारी किसी को नहीं है।

बच्चों के कारण वह अपने पति को नही छोड़ पाई लेकिन उसके पति के साथ उसका रिश्ता ठीक नहीं है।

विक्की के गुस्से को बचपन से झेलते आ रहें बच्चें कब तक उसका साथ देते ? विक्की ने कभी भी अपने बच्चों और पत्नी का साथ नहीं दिया था। बच्चों की जरूरतों के लिए पैसे लाकर पत्नी और बच्चों को दें देता और इसका भी धौंस सब पर जमाता रहता।

बच्चे बड़े हो रहें थे और साथ ही अपने पिता के लिए उनका गुस्सा भी बढ़ रहा था। कहते हैं इतिहास दुहराया जाता है। जों व्यवहार विक्की ने अपने पिता के साथ किया। उसके बच्चे भी अब वही सब कर रहे थे।

विक्की को अपनी गलती का एहसास हो चुका था।

वह एक पल की देरी किए बिना ही अपने गाॅंव की तरफ निकल गया। उसके पिता गाॅंव में अपने घर के बाहर द्वार पर ही कुर्सी पर बैठे हुए थें। उनके आस-पास ही गाॅंव के और भी कई प्रतिष्ठित लोग बैठकर बातें कर रहे थे।

जाते ही सबके सामने विक्की ने अपने पिता के पैर पकड़ लिए। वह लगातार अपने द्वारा किए गुनाहों की माफ़ी मांग रहा था। विजय शर्मा ने अपने बेटे को उठाकर अपने सीने से लगा लिया। बेटे को सीने से लगाते ही सालों से छलनी हुए दिल को सुकून मिल गया था।

दोनों की जिंदगी में एक दिन ऐसा भी आया था और उस दिन में आया वो पल जिसमें ना तो पिता ही अपने बेटे को सीने से अलग कर रहा था और ना बेटा ही अपने पिता के सीने से अलग होना चाहता था। जिंदगी में आए उस दिन के उस अनमोल पल को विजय शर्मा के पोतों ने अपने - अपने मोबाइल के कैमरे में कैद कर लिया।

विक्की ने अपनी पत्नी और बच्चों से भी अपने द्वारा किए गए आज तक के व्यवहार के लिए माफ़ी मांगी।

जब एक पिता ने अपने बेटे को माफ़ कर दिया था तो पत्नी और बच्चों ने भी अपने पति और पिता को माफ करने में देरी नहीं की।

विजय शर्मा का पूरा परिवार आज एक ही छत के नीचे गाॅंव वालों और अनाथ बच्चों के संग खुशियां मना रहा हैं और जिंदगी में आए एक दिन के बाद के वो अनमोल पल इस बात की गवाही दे रहे हैं कि हमारा किया गया कोई भी कार्य हम तक वैसे ही आता है जैसा हमने दूसरों के साथ किया होता हैं। महत्वपूर्ण बात तों यह हैं कि हम अपने परिवार के साथ मिलकर हर पल को खुबसूरत और यादगार बनाने की कोशिश करें ताकि हम सबकी जिंदगी में खुशियों के दीप जल उठे।


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