अनजान रास्ता
अनजान रास्ता
विभा और अतुल के विवाह को एक माह हो गया था।
वे हनीमून के लिए शिमला जाने वाले थे,लेकिन पापा की तबियत अचानक खराब हो गई तो उनकी ट्रिप कैंसिल हो गई। आज वीकेंड था। अतुल ने सोचा विभा को यहीं आस-पास कहीं ले जाता हूं। थोड़ा चेंज हो जाएगा यही सोचकर उन्होंने सरिस्का अभयारण्य घूमने का प्रोग्राम बना लिया। यह जगह जयपुर से दो-ढाई घंटे की दूरी पर थी। शनिवार सुबह दोनों कार से निकल गए। सरिस्का पहुंच कर उन्होंने रिजोर्ट में कमरा बुक कर लिया। दिन भर वे घूमते रहे। सिलीसेढ़ झील में बोटिंग की। बहुतअच्छा बीता था उनका दिन। अगले दिन भानगढ़ जाने का प्रोग्राम बना लिया। यह विश्व विख्यात हारर प्लेस था। वहां स्पष्ठ लिखा था कि पांच बजे के बाद यहां कोई नहीं रूकेगा।
बड़ी अजीब सी जगह थी वह..साफ सुथरी.. वहां सिर्फ दरवाजे पर ही गार्ड था, कौन करता है यहां कि सफाई?
वहां की कहानी भी बड़ी अजीब थी...और वहां व्याप्त शांति भी बड़ी अजीब थी,विभा का सिर भारी हो रहा था.चलो अतुल! यहां से चलो, मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा। ये कोई घूमने की जगह है।
शाम होने वाली थी। गार्ड वहां से लोगों को बाहर जाने के लिए कह रहा था। विभा और अतुल भी बाहर आ गए। विभा का सिर फटा जा रहा था। अतुल ! कहीं अच्छी जगह पर चाय पिलवा दो, मेडिसिन ले लूं। बड़ी अजीब सी जगह थी वह। चाय पीने के लिए दोनों होटेल में रूके। रिलेक्स महसूस करने के बाद विभा बोली-अतुल सुबह चलें, यहीं रूक जाते हैं। नहीं विभा दो-तीन घंटे में घर पहुंच जाएंगे। यहां रूक कर क्या करना है?विभा चुप रही। अतुल कार चला रहा था। विभा के दिमाग में भानगढ़ का सन्नाटा घूम रहा था। आठ बज चुके थे। हाइवे पे रौनक थी,अचानक अतुल ने एक सुनसान सड़क पर कार मोड़ दी। विभा की तंद्रा टूटी। ये क्या अतुल!तुम इस अंधेरी और सुनसान सड़क पर गाड़ी क्यों ले आए?उसी रास्ते पर चलते तो क्या बिगड़ जाता?झल्ला उठी विभा।
भानगढ़ के भूत दिख रहें हैं क्या,अरे इस रास्ते से हम जल्दी पहुंचेंगे।
पता नहीं,पर मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है। इतना सुनसान बियाबान रास्ता! यहां दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा है। पर तुम तो मेरी बात सुनते ही नहीं अतुल। अरे मैं हूं तो तुम्हारे साथ क्यों डर रही हो?
अचानक कार घर्र-घर्र करके रूक गई। चारों और अंधेरा।
तुम गाड़ी में ही रहना विभा, मैं देखता हूं। अतुल ने मोबाइल की टार्च जलाकर देखने की कोशिश की, लेकिन समझ में नहीं आ रहा था, खराबी क्या है। पेट्रोल भी पूरा था। अतुल परेशान हो उठा। दूर-दूर तक मदद के आसार
नहीं थे। वह चुपचाप गाड़ी में आकर बैठ गया। विभा कुछ कहोगी नहीं!क्या बोलूं,अब तो फंस गए। तुमने मेरी बात मानीनहीं।
दोनों चुप थे। गाड़ी में बैठे यही सोच रहे थे कि घर कैसे पहुंचे? यहां तो दूर-दूर तक रोशनी भी नहीं है। मदद तो कहां से मिलेगी। आस-पास कहीं कोई होटल मिल जाए। लेकिन इस सुनसान में पैदल चलना खतरे से खाली नहीं था। दो घंटे बीत गए तभी एक अजनबी आदमी गाड़ी के कांच पर दस्तक देने लगा।
अरे भाया कौन हो ? यहां जंगल में कैसे?
अतुल ने थोड़ा कांच नीचे सरकाया। भाईजी !गाड़ी खराब हो गई। क्या यहां आस-पास रूकने की व्यवस्था है। उस डरावनी शक्ल वाले अजनबी को देख विभा ने अतुल का हाथ खींचा। लेकिन अतुल कुछ सुने तब ना। वह तो जैसे सोचने-समझने की बुद्धि खो बैठा था।
भाया यहां पास में एक खंडहर है। हम वहीं रहते हैं अगर उचित समझो तो चलो। अजनबी के कहने पर दोनों उसके पीछे-पीछे चल दिए। विभा ने देखा कि उसने एक अंगूठी पहन रखी थी जो अंधेरे में चमक रही थी। काला रंग अंधकार में घुल-मिल गया था, बाल जटाओं जैसे और चेहरे पर भयानक दाढ़ी-मूंछ थी। विभा को उसके साथ जाना अच्छा नहीं लग रहा था,पर अतुल तोजैसेसम्मोहित हो गया था। आधा घंटा चलने के बाद एक खंडहर जैसे मकान के सामने वह रूक गया। उसे देख विभा कांप उठी। भानगढ़ फिर जीवंत हो उठा था। उसने दोनों को अंदरआने को कहा। अंदर एक लालटेन जल रही थी। एक खाट पड़ी हुई थी-यहां पर यही मिलेगा बाबू, तुम दोनों यहां रूको कोई जरूरत हो तो बता देना और हां किसी भी चीज को हाथ मत लगाना। विभा का डर के मारे बुरा हाल था। वह लालटेन उठाकर जगह देखने लगी। एक पल में उसे समझ में आ गया कि यहां बरसों से कोई नहीं आया,कितने बड़े-बड़े मकड़ियों के जाले थे और मकड़ी भी बड़ी अजीब,वह खाट पर बैठ गई,अतुल!अब भी समय है,गाड़ी में चलो,ये जगह मुझे ठीक नहीं लग रही। देखो ये मकड़ियां ..तभी लालटेन बुझ गई..विभा की चीख निकल गई। अंधेरे में कुछ सुझाई नहीं दे रहा था। अतुल तो जैसे पत्थर सा हो गया था। दोनों खाट पर बैठ गए। एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ रखा था। उनकी पलकें अपने आप भारी हो रहीं थीं। एक दूसरे से टिके बोझिल पलकों से वे अंधेरे में कुछ देखने की कोशिश
कर रहे थे। तभी एक साए को उन्होंने महसूस किया। वह उनके नजदीक था। कुछ अस्पष्ट आवाजें सुनाई दे रही थी। शरीर पर कुछ रेंगता सा महसूस हो रहा था। ऐसा लग रहा था कि बहुत सारी मकड़ियां उनके शरीर पर रेंग रहीं हों। वे उस अजनबी को आवाज देना चाहते थे,पर आवाज गले में घुट गई थी।
अतुल बेहोश हो गया था,विभा उसे हिला रही थी, वह वहां से भागना चाहती थी,पर न हाथ उठ रहे थे न पैर, अचानक एक अजीब सी रोशनी दिखाई दी और उसने देखा कई लोग जो सफेद लबादे में थे, वहां नाच रहे थे, मकड़ियां उसके और अतुल के शरीर पर चल रहीं थीं,वह उन्हें हटाना चाहती थी, लेकिन पत्थर जैसे शरीर को हिलाना मुश्किल था। वह अजनबी कहीं न था,उसकी वह चमकदार अंगूठी-अरे ये रोशनी तो उसकी अंगूठी की है। उन सायोंं ने अतुल और विभा को एक खंभे से बांध दिया था। इसके आगे विभा कुछ न देख पाई,वह बेहोश हो गई, सुबह एक गडरिए ने उन्हें आकर खोला। उनके शरीर पर
घाव थे,उनसे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उनका खून निकाल लिया हो।
आप लोग यहां कैसे आए बाबू, यहां तो रात में लुटेरे ही
घूमते हैं। आप जिंदा कैसे बच गए।
अरे हमारी गाड़ी खराब हो गई थी। इसलिए..!
सांझ ढले इस राह कोई नहीं गुजरता बाबू,आप हाइवे की
जगह इस अनजान रास्ते पर क्यों आए।
अतुल और विभा अपने घाव देख रहे थे,वे चल पाने की स्थिति में नहीं थे, गड़रिया परेशान हो उठा। आपकी गाड़ी
तो अब आपको नहीं मिलेगी। वह वहां होगी ही नहीं। आप
गांव चलो, आपके जाने की व्यवस्था वहीं से होगी। बच गए आप, यही बहुत है उन्होंने आज तक किसी को जीवित नहीं छोड़ा। इसलिए इधर कोई नहीं आता। उनका सारा सामान भी गायब था। विभा गुमसुम थी।
अपने शरीर के साथ हुए खिलवाड़ को महसूस कर रही थी। पत्थर बनी विभा की खामोशी अतुल को परेशान कर
रही थी। किसी तरह अतुल विभा को लेकर जयपुर पहुंचा। सीधे अस्पताल लेकर गया विभा को। डाक्टर ने एंटीबायोटिक दवाएं दी। विभा शून्य हो गई थी। सदमे में उसे सिर्फ़ वे डरावनीआवाजें ही सुनाई दे रही थी। डाक्टर
ने विभा का चेकअप किया। और अतुल को जो रिपोर्ट सौंपी, उसे पढ़कर अतुल की आंखों में अंधेरा छा गया।
गैंगरेप की शिकार हुई थी विभा और वह उसकी कोई
मदद नहीं कर पाया। अतुल विभा की हालत पर परेशान था कि आखिर क्यों उसने विभा की बात नहीं मानी। आखिर वह उस अनजान रास्ते पर गया क्यों ?
