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अग्निसुता द्रौपदी

अग्निसुता द्रौपदी

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महाभारत ग्रंथ के अनुसार एक बार राजा द्रुपद ने कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य का अपमान कर दिया था। गुरु द्रोणाचार्य इस अपमान को भूल नहीं पाए।

इसलिए जब पण्डवों और कौरवों ने शिक्षा समाप्ति के पश्चात गुरु द्रोणाचार्य से गुरु दक्षिणा माँगने को कहा तो उन्होंने उनसे गुरु दक्षिणा में राजा द्रुपद को बंदी बनाकर अपने समक्ष प्रस्तुत करने को कहा।

पहले कौरव राजा द्रुपद को बंदी बनाने गए पर वो द्रुपद से हार गए। कौरवों के पराजित होने के बाद पांडव गए और उन्होंने द्रुपद को बंदी बनाकर द्रोणाचार्य के समक्ष प्रस्तुत किया। द्रोणाचार्य ने अपने अपमान का बदला लेते हुए द्रुपद का आधा राज्य स्वयं के पास रख लिया और शेष राज्य द्रुपद को देकर उसे रिहा कर दिया।

गुरु द्रोण से पराजित होने के उपरान्त महाराज द्रुपद अत्यन्त लज्जित हुये और उन्हें किसी प्रकार से नीचा दिखाने का उपाय सोचने लगे। इसी चिन्ता में एक बार वे घूमते हुये कल्याणी नगरी के ब्राह्मणों की बस्ती में जा पहुँचे।

वहाँ उनकी भेंट याज तथा उपयाज नामक महान कर्मकाण्डी ब्राह्मण भाइयों से हुई। राजा द्रुपद ने उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न कर लिया एवं उनसे द्रोणाचार्य के मारने का उपाय पूछा।

उनके पूछने पर बड़े भाई याज ने कहा, “इसके लिये आप एक विशाल यज्ञ का आयोजन करके अग्निदेव को प्रसन्न कीजिये जिससे कि वे आपको वे महान बलशाली पुत्र का वरदान दे देंगे।” महाराज ने याज और उपयाज से उनके कहे अनुसार यज्ञ करवाया।

 उनके यज्ञ से प्रसन्न हो कर अग्निदेव ने उन्हें एक ऐसा पुत्र दिया जो सम्पूर्ण आयुध एवं कवच कुण्डल से युक्त था। उसके पश्चात् उस यज्ञ कुण्ड से एक कन्या उत्पन्न हुई जिसके नेत्र खिले हुये कमल के समान थे, भौहें चन्द्रमा के समान वक्र थीं तथा उसका वर्ण श्यामल था।

उसके उत्पन्न होते ही एक आकाशवाणी हुई कि इस बालिका का जन्म कौरवों के विनाश के हेतु हुआ है… बालक का नाम धृष्टद्युम्न एवं बालिका का नाम कृष्णा रखा गया जो की राजा द्रुपद की बेटी होने के कारण द्रौपदी कहलाई।

 

द्रौपदी पूर्व जन्म में एक बड़े ऋषि की गुणवान कन्या थी। वह रूपवती, गुणवती और सदाचारिणी थी, लेकिन पूर्वजन्मों के कर्मों के कारण किसी ने उसे पत्नी रूप में स्वीकार नहीं किया।

इससे दुखी होकर वह तपस्या करने लगी। उसकी उग्र तपस्या के कारण भगवान शिव प्रसन्न हए और उन्होंने द्रौपदी से कहा तू मनचाहा वरदान मांग ले।इस पर द्रौपदी इतनी प्रसन्न हो गई कि उसने बार-बार कहा मैं सर्वगुणयुक्त पति चाहती हूं।

भगवान शंकर ने कहा तूने मनचाहा पति पाने के लिए मुझसे पांच बार प्रार्थना की है। इसलिए तुझे दुसरे जन्म में एक नहीं पांच पति मिलेंगे। तब द्रौपदी ने कहा मैं तो आपकी कृपा से एक ही पति चाहती हूं। इस पर शिवजी ने कहा मेरा वरदान व्यर्थ नहीं जा सकता है। इसलिए तुझे पांच पति ही प्राप्त होंगे।

द्रौपदी के सभी नाम और उनके अर्थ 

 १- द्रौपदी 

 द्रौपदी का यह नाम उनके पिता द्रुपद के कारण मिला।

 २- पांचाली 

 द्रौपदी पांचाल देश की राजकुमारी थीं। इसलिए उनका नाम पांचाली पड़ा।

 ३- कृष्णा 

 इनका जन्म का नाम कृष्णा था। हालांकि कई जगहों पर भगवान् कृष्ण की सखी होने के कारण इन्हें कृष्णा कहा जाता है।

 ४- याज्ञनी 

 यज्ञ से पैदा होने के कारण इन्हें याज्ञनी कहा गया।

 

५- सेरंध्री 

 द्रौपदी का एक नाम यह भी है। अज्ञातवास के दौरान राजा विराट के जब पांडवों ने भेष बदलकर कार्य किया। उसी समय उनका नाम सेरंध्री पड़ा।

 

 Why did Draupadi marry all 5 Pandavas?

 महाभारत कथा में इससे जुड़े दो प्रसंग आते हैं पहला प्रसंग यह कई कि द्रौपदी पूर्व जन्म में एक बड़े ऋषि की गुणवान कन्या थी। वह रूपवती, गुणवती और सदाचारिणी थी, लेकिन पूर्वजन्मों के कर्मों के कारण किसी ने उसे पत्नी रूप में स्वीकार नहीं किया।

 इससे दुखी होकर वह तपस्या करने लगी। उसकी उग्र तपस्या के कारण भगवान शिव प्रसन्न हए और उन्होंने द्रौपदी से कहा तू मनचाहा वरदान मांग ले। इस पर द्रौपदी इतनी प्रसन्न हो गई कि उन्होंने हडबडाहट में बार-बार कहा मैं सर्वगुणयुक्त पति चाहती हूं।

भगवान शंकर ने कहा तूने मनचाहा पति पाने के लिए मुझसे पांच बार प्रार्थना की है। इसलिए तुझे दुसरे जन्म में एक नहीं पांच पति मिलेंगे। तब द्रौपदी ने कहा मैं तो आपकी कृपा से एक ही पति चाहती हूं। इस पर शिवजी ने कहा मेरा वरदान व्यर्थ नहीं जा सकता है। इसलिए तुझे पांच पति ही प्राप्त होंगे।

 

 दूसरा प्रसंग 

 दूसरा प्रसंग यह है कि स्वयंबर के बाद जब द्रौपदी के साथ पांडव घर लौटे तो उनकी माता कुंती ने कहा कि जो कुछ लाये हो उसे आपस में बांट लो। तब उन्हें स्वयंबर के बारे में पता नहीं था। लेकिन अब माता कुंती की बात काटी नहीं जा सकती थी और इस तरह से द्रौपदी का विवाह पाचों पांडवों से हुआ।

 

 द्रौपदी के सभी पुत्रों के नाम 

 १- युधिष्ठिर और द्रौपदी के पुत्र का नाम प्रतिविन्ध्य था।

 २- भीम से उत्पन्न पुत्र का नाम सुतसोम था।

 ३- अर्जुन के पुत्र का नाम श्रुतकर्मा था।

 ४- नकुल के पुत्र का नाम सतानिक था।

 ५- सहदेव के पुता का नाम श्रुतसेन था।

 

 Did Draupadi really love Karna? क्या द्रौपदी कर्ण से सच में प्यार करती थीं?

 

महाभारत की कहानी में जाम्बुल अध्याय है। जिसमें द्रौपदी सहित सभी पांडवों अपने- अपने रहस्यों का रहस्योद्घाटन किया। द्रौपदी से पाँचों पांडवों में भीम सबसे अधिक प्रेम करते थे। हालांकि द्रौपदी अर्जुन से अधिक प्रेम करती थी, लेकिन अर्जुन सुभद्रा से अधिक प्रेम करते थे।

जब पांडवों के निर्वासन का १२वां वर्ष प्रगति पर था, उसी दौरान जंगल से गुजरते हुए द्रौपदी ने जामुन के पेड़ पर पका हुआ जामुन का गुच्छा देखा और उसे तोड़ लिया।

जैसे ही उन्होंने गुच्छा तोड़ा, श्रीकृष्ण वहाँ आ गए और उन्होंने बताया कि इस फल को खाकर एक साधू अपने १२ वर्ष का उपवास तोड़ने वाले थे। अब चूँकि द्रौपदी ने फल तोड़ लिया था और इससे वे साधू के कोप का शिकार हो सकते थे। अतः उन्होंने कान्हा से प्रार्थना की।

 तब भगवान् कृष्ण ने कहा कि इसका एक ही उपाय है। इस फल को जामुन के पेड़ के नीचे रखकर सबको अपने राज खोलने होंगे और सच बोलना होगा, फिर यह फल वापस पेड़ से लग जाएगा।

सबसे पहले युद्धिष्ठिर ने कहा, विश्व में सत्य, अहिंसा, सहिष्णुता का प्रचार होना चाहिए और बेईमानी, दुष्टता, पाप का नाश होना चाहिए। युधिष्ठिर ने पांडवों के साथ हुए सभी बुरे घटनाक्रमों द्रौपदी को ठहराया। युधिष्ठिर के सत्य वचन कहने पर फल जमीन से दो फीट ऊपर आ गया।

अब भीम की बारी आई। भीम ने कहा कि भोजन, युद्ध और निद्रा के प्रति उनकी आसक्ति क्कभी कम नहीं होती है। उन्होंने कहा कि वे सभी कौरव भाइयों का वध कर देंगे।

उन्होंने कहा कि युधिष्ठिर के प्रति उनके मन में बहुत अधिक श्रद्धा है, लेकिन अगर किसी ने उनके गदा का अपमान किया तो वे निश्चित उसका वध कर देंगे। उनके सच बोलने पर फल थोड़ा और ऊपर आ गया।

अब अर्जुन की बारी आयी। उन्होंने कहा कि प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि मुझे अपने जीवन से अधिक प्रिय है। उन्होंने कहा कर्ण का वध उनके जीवन का मुख्य लक्ष्य है और इसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। अब फल और भी ऊपर आ गया।

उसके बाद नकुल और सहदेव ने भी अपने राज बता दिए। अब द्रौपदी की बारी थी। उन्होंने कहा कि मेरे पांच पति ५ ज्ञानेन्द्रियो की तरह हैं। लेकिन मैं सभी के दुःख का कारण हूँ। मैं शिक्षित होने के बावजूद बिना सोच विचार कर कार्य किये और इसके लिए पछता रही हूँ।

 

 लेकिन इसके बावजूद फल ऊपर नहीं गया। तब कान्हा ने कहा कि द्रौपदी किसी रहस्य को छिपा रही हैं। तब द्रौपदी ने कहा कि मैं पांचो पांडवों के अतिरिक्त किसी और से भी प्यार करती हूँ और वहकर्ण है।

जाती की वजह से मैंने उनसे विवाह नहीं किया और उसका पछतावा मुझे है। अगर मैंने कर्ण से विवाह किया होता तो आज मुझे यह दिन ना देखने पड़ते। यह सुनकर पांडव हैरान रह गए। उन्हें आभास हुआ किया कि जिस वक्त द्रौपदी को उनकी सबसे अधिक आवश्यकता थी, उस वे कुछ नहीं कर सके।

 

द्रौपदी के इतना कहते ही फल वापस पेड़ पर लग गया।



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