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Prafulla Kumar Tripathi

Comedy Fantasy Inspirational


4.5  

Prafulla Kumar Tripathi

Comedy Fantasy Inspirational


आपा धापी ज़िंदगी !

आपा धापी ज़िंदगी !

3 mins 230 3 mins 230

अतुल के जीवन में मांस,अस्थि,मज्जा के साथ साथ हास्य का कुछ ज्यादा ही हिस्सा था। इसीलिए उनसे सहज ही लोग आकृष्ट हो जाया करते थे। वे बचपन से हंसोड़ थे। उनको कोई जोकर या मेहरा(भोजपुरी का शब्द) कहकर बुलाता था तो वे कतई बुरा नहीं माना करते थे।

 फिल्मों की दुनियां के तनाव भरे, भागमभागी माहौल में भी अतुल अपना हास्यपरक स्पेस निकाल लिया करते थे। सुनने सुनाने को कुछ नहीं तो वह उठा लिया करते थे अकबर - बीरबल के रसभरे क़िस्से ही सही !

हां,उनकी इस प्रवृत्ति का घरवाले ख़ासतौर से बड़े लोग बहुत तवज्जो नहीं देते थे। हां,बच्चों में वे लोकप्रिय थे।

"दादू,आओ..छुपी छुपाई खेला जाय !"

अभी वे अपनी पोती अविषा की फ़रमाइश पूरी करते कि पोता दर्श उनसे लूडो खेलने की जिद कर बैठता। असल में वे इन बच्चों से सिर्फ़ हारने के लिए खेला करते थे और खेल के बीच बीच में विभिन्न उतार चढ़ावी स्वरों के निकालते रहने से उनसे बच्चे मंत्रमुंग्ध रहा करते थे।

 लेकिन उनकी पत्नी अपनी डिप्रेशन की प्रवृत्ति और तुनकमिजाजी स्वभाव के चलते माहौल में आनंद लेने के बजाय उनसे कुढ़ा करती थीं।

"कुछ करना ना धरना,चौबीसों घंटे इन शरारती बच्चों के साथ चिल्ल पों करते रहना ही आपको आता है। ..शाम की सब्जी की चिंता नहीं है!" ....मैडम उवाच हुआ करता था।

मुम्बई में सच्चे और नि:स्वार्थी मित्रों का लगभग अकाल सा है। अतुल भी इससे प्रभावित थे। लेकिन पुरबिया लोगों की अच्छी खासी संख्या होने से उनकी मित्र मंडली में कुछ हंसोड़ मित्र शामिल हो चले थे।

ऐसे ही एक मित्र थे सूदन गुरु जिनका शुद्ध नाम था सुदर्शन । वे उस कालखंड की उपज थे जब यू.पी.बोर्ड का हाई स्कूल पास करना टेढ़ी खीर हुआ करता था। बनारस में उनकी पढ़ाई लिखाई चली थी और अपनी शातिराना हरकतों से उन्होंने किसी किसी तरह इंटर तक पढ़ाई कर डाली थी और मुम्बई आ गये थे। एक सेठ की फैक्ट्री में चौकीदारी से शुरुआत करते आज मैनेजर बन चले है।

तो सूदन गुरु इस समय अतुल के दौलतखाने को अपने कहकहों से गुलजार कर रहे हैं....

"तो जनाब ! एक बार अकबर बादशाह ने एक पुस्तक लिखकर छपवाई ।

बादशाह उसे बहुत ही सुन्दर पुस्तक समझने लगे थे । लेकिन मामला उल्टा पुल्टा था जिसे बीरबल समझते थे। एक दिन बीरबल ने कहा -

" हुजूर ! आपने बड़ी कमाल की पुस्तक लिखी है । आज मैंने घीसा हलवाई के पास देखी थी ।

बादशाह बोले - "अच्छा ! क्या उसने पूरी पढ़ी भी ? ....क्या कहता था वह ?" बीरबल ने कहा -

"हुजूर ! पढ़ता ही नहीं रहा था , बल्कि वह तो उसमे चमचम बाँधकर बेचता भी रहा है !"

इस पर बादशाह को बड़ी खिसियाहट हुई और उन्होंने असलियत समझ ली और सब पुस्तक इकट्ठी करवा कर अग्निदेव को भेंट कर दी ।  

माहौल में ठहाके की प्रतिध्वनियां गूंजने लगीं। अब अतुल की बारी थी।

हुआ यूं कि एक बार बादशाह खिजाब लगा रहे थे । वे मज़ाक में बीरबल को नीचा दिखाने के लिए बोले -

"बीरबल ! जो लोग खिजाब नहीं लगाते उनका दिमाग बड़ा रद्दी होता है। "

इस बात को सुनकर बीरबल ने उत्तर दिया - "जहाँपनाह ! खिजाब न लगाने वालों का दिमाग तो ख़राब होता है , पर अपन के हिसाब से तो खिजाब लगाने वालों के दिमाग ही नहीं होता । "

ठहाके लगाते हुए उस दिन से बादशाह अकबर ने ख़िजाब लगाना बंद कर दिया ।

सूदन गुरु के साथ की यह बैठकी अब लगभग समापन पर थी। डिनर लेकर वे चले गये।

अतुल सोने की तैयारी कर ही रहे थे कि प्रोडयूसर माही का फोन आ गया।

"हेलो,मैं माही बोल रहा हूं। "उधर से आवाज़ आई।

"जी,सर !"अतुल ने उत्तर दिया।

"अतुल बची हुई स्क्रिप्ट का क्या हुआ ?..कब तक सबमिट कर रहे हो ?"

"सर,बस अब फाइनल स्टेज पर है। "अतुल ने सफाई दी।

"नहीं,नहीं मुझे इस हफ्ते वह चाहिए ही चाहिए..। "

"जी..जी अच्छा.. गुड नाइट । "अतुल ने फोन रख दिया और सोने की तैयारी करने लगा।


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