आज के बच्चे
आज के बच्चे
आज सहाय साहब रिलेक्स मूड में थे। आखिर बारह वर्ष से उन पर चल रहे मुकदमे का जजमेंट उनके पक्ष में आ गया था। चूंकि पत्नी जी रिजल्ट की चिंता में ही अभी दो वर्ष पहले ही इस लोक से परलोक वासिनि हो चुकी थीं। अतः मन के खालीपन को भरने के लिए वे कमरे में टंगी उनकी तस्वीर से चाहे जब अपने मन की बात करने लगते थे।
आज सुबह ही उनकी बेटी मथुरा से उनसे मिलने आयी है। लेकिन उनके उदासीन रवैए से ख़फ़ा होकर वह वापस एक घंटे में ही चली जाती है। उसी की शिकायत वे अपनी पत्नी की तस्वीर से करने लगते हैं।
' हमेशा से ही इतनी तुनक मिजाज है कि समझ नहीं आता, आगे कैसे गृहस्थी खिंचेगी। देख रही हैं आप तस्वीर से '
' ये नाटक तो देखने ही होंगे जी ! आप तो सुकून ढूंढिए अपना। बच्चों को भी अपना रोष व्यक्त करने का जरिया चाहिए कि नहीं ? अगर आप ही नहीं सुनेंगे, समझेंगे तो दुनिया में कौन है उनका । मन छोटा न कीजिए अब संध्या समय हो रहा है,दीया जला दीजिए मंदिर में।'
सहाय जी अपने घुटनों पर हथेलियां रखते हुए वाशबेसिन तक पहुंचते हैं और सोचते हैं...' .कितना बोझ बढ़ गया है अब बेटियों पर भी ...एक पाँव ससुराल में एक पीहर में और फिर ड्रायविंग, हाउसकीपिंग, आफिस और भी न जाने कितने घर के झंझट । पहले हमारी माँ को सिर्फ घर ही सम्हालना होता था और अब तो दोहरी-तिहरी जिम्मेदारी होती जा रही है। ठीक वैसे ही जैसे एक पुत्री के पिता की बढ़ती है। उन्नति विज्ञान की होती है और हर अविष्कार की मार एक बेटी के पिता पर पड़ती है। कभी हाथ घड़ी से शुरू हुई यह दौड़ साइकिल,मोटर साइकिल,फोर व्हीलर, वाशिंग मशीन , माइक्रोवेव,फ्रिज,लेपटाप , ए सी। क्या कमाल है कि अब तो एयरकंडीशनर का बिल, गाड़ी का पेट्रोल भी मांगने लगे हैं लड़के वाले।' उन्होंने सामने तस्वीर की ओर देखते हुए कहा।
'...खुश होना चाहिए आपको तो , यह सब नहीं देना पड़ा । वैसे बेटियों का हक होता है कि नहीं अपने पिता की सम्पदा में ? महान संस्कार हैं हमारी संस्कृति के, जिसमें लड़के और उसके पिता की हैसियत लड़की के विवाह में किए गये खर्च से होती है। अब ज्यादा क्या कहूँ आपने भी तो कहा था शुरू में जब मैं आपके साथ रहने गयी थी तो ..., ' जाओ और अपनी जरूरतों के लिए अपने पापा से कहो'... पुरानी बातें याद करते हुए सहाय साहब अपने शुरुआती दौर में सैर करने पहुँच गये। क्या गुरूरी थीं तुम मेरे सामने आकर शेरनी की तरह खड़ी हो गयी थीं।
मुझे धिक्कारते हुए कहा था, 'आपको ऐसा कहते समय लज्जा नहीं आयी। चूहा समझ कर ब्याह कर लाए थे घोड़े पर चढ़कर ,सिर पर पगड़ी बांध कर ?
एक बारगी मन में आया कि बुजुर्गो की कही बात आजमा ली जाए कि बीबी को शुरू में ही काबू रखना वरन् सिर पर चढ़ कर बोलेगी। जैसे ही मैंने अपना हाथ उसके मुंह की ओर बढ़ाया तो पकड़ कर पटखनी लगा दी थी मुझे। कहा था खबरदार सूबेदार साहब! .".यहाँ कम्हड़ बतिया कोऊ नाहीं जो तर्जनी देख मुरझायीं।" 'याद रखियेगा अगर एक बार मैंने आपकी चौखट से बाहर कदम रख दिया तो वापसी नहीं होगी। ये हाथ जो आपके पास हैं , परमात्मा ने मुझे भी दिए हैं । अबला नारी की बुनियाद आप जैसे लोगों ने ही रखी है और उसका पोषण भी आप जैसे लोगों ने किया है। धर्म, संस्कृति,संस्कार न जाने कितने भारी भरकम शब्दों का बोझ आपके आधिपत्य, पराधीन, चरणों की दासी जैसे शब्दों और पाशविकता की छत्रछाया तले पांवों की पैंजनियां की रुनझुन और मांग के सिंदूर की लालिमा में नेस्तनाबूद हो जाते हैं और शेष बची स्त्री वह नहीं रहती जो वह होती है। एक मौन स्वीकृति और कर्तव्य बोध उसे घर से बाहर निकलने ही नहीं देते।'
सहाय साहब ने सामने लगी तस्वीर पर नजर भर देखा ।
....' अब इतनी समझ आयी है जब एक बेटी का पिता बना हूँ और अपने बेटे के लिए बहू लेने गया था तो समधी जी की आँखों में मान ,सम्मान , रौब-दौब की जगह निरीह होने का भाव जैसे कि हम उनकी बेटी को अपनी बहू बनाकर उन पर अहसान कर रहे हैं। हमारे समाज में इसे भद्र लोकाचार का प्रारूप कह कर प्रगति शील होने का नाटक अवश्य कर सकते हैं। मगर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बेटी वाले कभी यह डिमांड नहीं रख सकते कि आप हमारी लड़की से गृह कार्य नहीं करवाएंगे...या कि हर माह हाथ खर्च देंगे...या अपमानित नहीं करेंगे या चली जाओ यह घर छोड़ कर क्योंकि यह घर लड़के के माता पिता का है। जिसमें वह तब तक रह सकती है जब तक हम चाहेंगे। आज तो लड़के वाले धेला नहीं लगाना चाहते हैं। पहले कम से कम कपड़े, गहने तो बनवाया करते थे। बारात घोड़ी का ख़र्च उठाते थे। अब सब भार बेटी के बाप पर है। यही कारण है कि बेटियों के प्रति चाहत कम हुई है। असली बात तो कहना ही नहीं चाहते हम कि ये कौन सा रिवाज है जिससे आप अपने बेटे को नीलामी की बोली में एक असैट की तरह से प्रमोट करते हैं। और कहते हैं कि "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।"
' अब इतने नादान भी न बनिए । यह तो रीति है.. सीता माता के साथ भी राजा जनक ने कितना धन-धान्य प्रदान किया था ।' तस्वीर फिर बोलने लगती है..
' तभी एक घंटे बाद फोन की घंटी बजती है। देखा तो सुरजी फ़्लैश हो रहा था। झट से रिसीव किया ...हाँ बेटे पहुँच गये आप ?'
'..जी पापा! पहुँच जाऊंगी तभी न कॉल करूंगी।'
... 'ठीक है अपना ध्यान रखना और खुश रहिए,अब रखता हूँ।'
'..इतनी जल्दी क्या है? अभी मैंने अपनी बात शुरू भी नहीं की और रखने की बात करने लगे। देखिए अब आप अपना ख्याल ठीक से रखना शुरू कर दीजिए वर्ना मुझे यहाँ लाना पड़ेगा आपको। बैग में कुछ खजूर, अंजीर और ड्रायफ्रूट्स रखें हैं मैंने। खोल कर देख लीजिएगा और हाँ ये आपके खाने के लिए हैं देखने के लिए नहीं। हर रोज पता करूँगी आपसे,आप क्या खा रहे हैं और क्या नहीं। '
एक गहरी सांस लेते हुए। सहाय साहब सोचने लगे । आजकल के बच्चे भी कितने अधिकार से अपने माँ-बाप को अपने काबू में रखना जानते हैं। हमारे जमाने में तो बात करने की हिम्मत ही नहीं होती थी। हूं कहते हुए उन्होंने कहा, 'ठीक है। '
"अपने लाडले दामाद जी से बात नहीं करिएगा क्या ? दे रही हूँ उन्हीं को ।' दर्पण! दर्पण! कहाँ हैं आप ? पापा आपसे बात करना चाहते हैं।'
'आ रहा हूँ ..जरा दर्पण तो देख लूँ ... वीडियो काल का भी कोई प्रोटोकॉल होता है कि नहीं ? '
'अरे हलवाई पोज़ सबसे अच्छा होता है आपका,आ भी जाइए घर जैसी ही बात है।'
अपने बेडरूम से बाहर आते हुए डायनिंग एरिया में सुरजी से फोन हाथ में लेते हुए, 'हांँ पापा जी प्रणाम !'
' कांग्रेचुलेशन पापाजी! कहीं कुछ राहत का आगाज़ तो हुआ वरन् इतने समय से भय और असमंजस का माहौल बना हुआ था परिवार में। अब एक फैमिली डिनर तो बनता ही है।'
"ठीक है जमाई सा ! आ जाईए इसी संडे। और हाँ दर्पण ने दर्पण देखना कब से शुरू कर दिया है ?'
' जब से आपकी लाड़ली ने दिखाना शुरू किया है पापा जी!' हँसी की आवाज के साथ ....लगभग आधे घंटे तक दोनों ही बातें करते रहे।
अंत में इस हफ्ते के इतवार को एक पारिवारिक पार्टी रखी गयी।
