आईने का रहस्य भाग 28
आईने का रहस्य भाग 28
सभी लोग परेशान हैं की आगे का रास्ता कैसे पता चलेगा चारो तरफ हरियाली थी, पर कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था, महतो और एक बुजुर्ग ध्यान लगाता है और कहता है, हमे सीधे ही आगे बढ़ना है, थोड़ी दूर पर मार्ग मिल जायेगा।
सभी सीधे आगे बढ़ते है, उन्हे सामने एक बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष दिखाई देने लगता है, थोड़ी ही देर में उस विशालकाय बरगद के पास पहूँच जाते हैं, वह उसके नीचे जैसे ही पहूँचते हैं, तभी एक आवाज़ आती हैं ठहरो।
सभी चौक कर इधर उधर देखते हैं, तभी एक पिशाच जो दिखने में बहुत ही भयंकर था वृक्ष से नीचे कूदता है, वह करी 12 फिट लंबा था, उसका शरीर हाथी के समान था, उसके बड़े बड़े नुकीले दांत बहुत ही खतरनाक लग रहा था, उसकी आंखो में तो जैसे खुन भरा था और लग रहा था की अभी टपकना शूरू हो जायेगा, उसके बाल शेर के श्याल की तरह है, !!
एक तरह से बहुत ही भयानक लग रहा था, उसे देख सभी चौक उठते हैं यहां तो सभी तांत्रिक थे पर उन्होंने भी साछात इतना बड़ा पिशाच नही देखा था, सभी उसे देखने लगते हैं, !!
एक तांत्रिक पूछता है, " तुम्हे क्या हुआ क्यों हमारा रास्ता रोके खड़े हो। वह कहता है, "तुम सब मेरे स्थान से जा रहे हो मेरा भोग कौन देगा।
जय पूछता है, " किस बात का भोग हम तो अपने राह चलते जा रहे हैं, हमे मणि ढूंढना है,, यह सुन वह जोर से हंसता है, और कहता है" तुम लोग पिद्दी से दिखने वाले उस मणि को ढूढने निकले हो अब पहले मेरा भोग मुझे दो, मेरी प्यास बुझाओ तब आगे जाओ,,!!!
महतो कहता है, " कैसा भोग चाहिए तुझे, हम लोग साधारण मानव नही है, हम सब तांत्रिक और साधक है।
वह हंसकर बोला," यह तक साधारण मनुष्य तो आ भी नही सकता है, खैर जो भी है यह से आगे बढ़ने से पहले मेरा भोग दे दो""! विशाल पूछता है " क्या चाहिए भोग में बिना बताए हम कैसे समझेंगे, ""!
पिशाच कहता है "तुम लोग कैसे तांत्रिक हो, तुम्हे ये भी पता नही चला कि मैं कौन हूँ। राकेश बोलता है," अरे तुम हो कोई भूत प्रेत उसमे क्या सोचना, और अब बहुत हो गया हमे जाने दे वरना हम अभी तुझे यही भस्म कर देंगे।
पिशाच को क्रोध आता है, वह कहता है, " तुम मुझे साधारण भूत प्रेत समझ रहे हो मैं पिशाच हूं पिशाच और मेरा भोग है रक्त में रक्त पान करता हूं और मानव रक्त से बढ़कर तो कोई नही होता और उसमे भी मादा का रक्त तो बहुत ही स्वादिष्ट होता है, और यहां तो तीन तीन मादा हैं तीनो को मेरे पास छोड़ दो तुम सब जाओ।
विशाल कहता है, " तु खुद को क्या समझ रहा है, अब हम तुझे उस लायक ही नहीं छोड़ेंगे कि तू किसी का रक्त पी सके, "! वह सबको इशारा कर कहता है," हम सब तुझे अभी भस्म करेंगे, अब तू स्वयं को बचाने की सोच।
सभी एक साथ मंत्र पढ़ना शुरू करते हैं तो पिशाच उन पर झपटता है तो सभी मंत्र पढ़कर उसके ऊपर फुकते हैं तो वह एकदम से विचलित हो उठा और फड़फड़ाने लगा, वह उन पर झपटता है, तो जय उसके सामने आता है और अभिमंत्रित अक्षत उसके ऊपर फेंकता है, तो पिशाच तड़प उठता है और वह घूम कर जय को पकड़ने के लिए आगे बढ़ता है तो, !!!
दुर्गा आगे आकर मंत्र पढ़ कर फुकती है तो वह फिर विचलित हो उठा,और गुस्से में पागल सा हो गया, अब सभी लाइन से उसे मंत्रो से अघात करने लगे, तो वह बेहाल हो गया और छटपटाने लगा,महतो मंत्र पढ़ कर अक्षत उस पर फेंकता है तो वह चिल्लाने लगता है।
सुनील उसके ऊपर अक्षत फेंकता है तो वह चीखने लगता है और, माफ़ी मांगने लगता है, पर जय कहते हैं " इसकी बातो में मत आना इसे भस्म करके आगे बढ़ना है, सभी में उसके पस्त पड़ने से और उत्साहित होकर उस पर मंत्री से अघात शुरू करते हैं तो वह चीख चीख कर छोड़ने की दुहाई देने लगता है, उसे पता नही था की ये सब इतने बड़े तांत्रिक या साधक हैं, वह तो इस गलत फहमी में था की ये साधारण साधक हैं और वह तो पिशाच है ये लोग उसका कुछ नही बिगड़ पाएंगे, इसी गलत फहमी में उसकी हालत खराब हो गई थी, और इन लोगो में से अधिकतर देखने में साधक या तांत्रिक लगते ही नही थे, !!
सभी के मंत्रो के मार से प्रताड़ित होकर वह उनके सामने समर्पण कर कहता है, " मुझसे आप लोगों को पहचानने में भूल हो गई, मुझे क्षमा करें मैं आपका साथ दूंगा मुझे भस्म मत करिए।
जय सबको देखता है और एक बार और मंत्र से अघात करने का इशारा करता है।
आगे कि कहानी अगले भाग में पढ़िए ""!!

