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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Abstract Comedy Inspirational

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Abstract Comedy Inspirational

आधुनिक डायन

आधुनिक डायन

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लो जी, सुना है कि मार्केट में अब कोई "आधुनिक डायन" आ गई है जिसने लेखन के क्षेत्र में धूम मचा रखी है। ये मार्केटिंग वाले भी पता नहीं क्या क्या नई नई चीजें परोसते रहते हैं। नई बोतल में पुरानी शराब बेचते रहते हैं। इन आइटम्स के विज्ञापन भी ऐसे करते हैं कि बेचारा आम आदमी उनके जाल में फंस ही जाता है। पहले तो ये "डायन" लेकर आए, फिर चुडैल ले आए। अब आधुनिक दिखने के चक्कर में आधुनिक डायन ले आए हैं शायद। तो हम भी इन विज्ञापनों में पड़कर शायद "आधुनिक डायन" के जाल में फंस गए लगते हैं। देखते हैं कि ये आधुनिक डायन किस बला का नाम है। 

वैसे तो हर "अबला" एक "बला" ही होती है। मुझे पता है कि मेरी बात नारीवादियों को चुभ रही होगी। अरे भाई, ये बात मैं खुद नहीं कह रहा हूं ये तो "अबला" ही कह रही है और बता रही है कि उसमें कहीं न कहीं "बला" छुपी हुई है। सयाने लोग कहते हैं कि एक तो बला , उस पर आधुनिक और तीसरे डायन भी ! अरे भाई लोगो , आज डरा डरा कर ही हलाल करने का इरादा है क्या ? पर हम भी बजरंग बली के चेले हैं, किसी ऐरी गैरी डायन से डरने वाले नहीं हैं। अरे जब मंहगाई डायन से आज तक नहीं डरे तो ये आधुनिक डायन क्या खाकर डरायेगी हमको ? 

हम यह सोचकर मॉर्निंग वॉक के लिए एक सूनी सी सड़क पर चलते जा रहे थे कि ये आधुनिक डायन कैसी होगी ? क्या पहनती होगी ? क्या खाती होगी ? कैसे हंसती होगी ? और भी बहुत सारे प्रश्न थे दिमाग में। हम सड़क पर चलते जा रहे थे कि अचानक एक दर्द भरी आवाज कानों में सुनाई पड़ी "हैल्प मी हैल्प मी"। मैं तुरंत उस ओर दौड़ा। वहां पर जाकर देखा कि एक लड़की अधनंगी सी सड़क के किनारे पड़ी पड़ी कराह रही है और "हैल्प हैल्प" चिल्ला रही है। 

मैं उसे देखकर घबराया और पूछा "बहन, क्या बात है" ? मेरे द्वारा बहन कहने पर वह चिढ गई और उसने मुझे घूर कर देखा फिर कहा "मैं कोई बहन वहन नहीं हूं। मैं तो मिस मॉडर्न हूं"। उसने अपनी नाक सिकोड़ ली थी। 

"अच्छा ठीक है मिस मॉडर्न, मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं" ? मैंने घबराते हुए पूछा 

उसने मेरी हैसियतदेख ली थी कि मुझे अंग्रेजी तो आती नहीं होगी इसलिएवह अहसान कर हिंदी में बोली "आप मुझे लिफ्ट दे सकते हैं क्या" ? उसने प्रश्न भरी आंखों से पूछा। 

"मेरे पास तो कोई साधन नहीं है। मैं तो मॉर्निंग वॉक पर आया हूं"। मैंने असमर्थता जताते हुए कहा 

"इडियट, बेवकूफ , डफर"। उसने अंग्रेजी में बहुत सारी गालियां निकालनी शुरू कर दी। अपना हाथ जरा अंग्रेजी में तंग है इसलिए हम उसकी गालियों को अपनी प्रशंसा समझ कर खुश होते रहे। इतने में वह बोली "प्लीज हैल्प मी, एक कार मुझे टक्कर मार कर भाग गई है। क्या आप मुझे पीठ पर बैठाकर सड़क तक ले जा सकते हैं" ? उसकी आंखों में याचना थी। 

अब मैंने गौर से देखा तो पाया कि वह सड़क से दूर एक खाई में पड़ी हुई थी। उसके हाथ पैरों से खून रिस रहा था। शायद उसके पैरों में मोच आ गई हो ? मानवता के नाम पर मुझे उसकी मदद करनी चाहिए। लेकिन मेरे मन ने कहा कि बेटे इसमें खतरा है, क्या पता यह "पीड़िता" के वेश में कोई "डायन" न हो ? 

संवेदनशीलता और कड़वी सच्चाई में कशमकश होने लगी। मदद करें या नहीं ? इतने में वो एक बार जोर से चीखी 

"ओ माई गॉड, आई एम डाइंग। आई डॉन्ट वान्ट टु डाई। प्लीज , सेव मी"। और वह बेहोश होने लगी। 

इससे ज्यादा हिंदी उसे आती नहीं थी शायद ? आजकल भारत में हिन्दी बोलता ही कौन है ? एक तो वो जिसे हिन्दी के सिवा कोई और भाषा आती ही नहीं है। दूसरे वो जो हिन्दी के लेखक, कवि या साहित्यकार हैं। और तीसरे वो जिनको राजनीतिक या पेशेवर मजबूरी के कारण हिन्दी बोलनी पड़ती है। हिन्दी का विरोध करना एक फैशन बन गया है इस देश में। कुछ आधुनिकतावादी लोगों ने हिन्दी को गंवारों की भाषा और अंग्रेजी को एक सभ्य भाषा का दर्जा देकर इसे "ऐलीट" घोषित कर दिया है। दूसरे , नेताओं ने अपने अपने स्वार्थ के कारण हिन्दी का विरोध करना प्रारंभ कर दिया है। और तो और हंसी तब और ज्यादा आती है जब बॉलीवुड के अभिनेता और अभिनेत्री जो हिन्दी फिल्मों की बदौलत सुपर स्टार बन गये हैं मगर उन्हें हिन्दी बोलने में शर्म आती है। इसे कहते हैं दोगलापन। लेकिन इन बेशर्म लोगों को फिर भी शर्म नहीं आती है। ये ट्रेंड धड़ल्ले से चल रहा है मार्केट में रहा है और हम जैसे लोग हिन्दी में गाली खाकर भी ऐसे दोगले लोगों को सुपर स्टार बनाए हुए हैं। 

संवेदनशीलता और कड़वी सच्चाई की कशमकश में आखिर संवेदनशीलता जीत गई और मैंने उसे सहारा देकर खड़ा किया। वह मुझे पकड़ कर खड़ी हो गई और मैंने उसे अपनी पीठ पर लाद लिया। बिल्कुल वैसे ही जैसे विक्रम ने बेताल को पीठ पर लादा था। बहुत वजन था उसमें। पता नहीं कितना "चरती" थी वह ? कद्दू की तरह फूली हुई थी। उसे पीठ पर लादते समय मुझे अपनी नानी याद आ गई। 

मैं जैसे तैसे करके उसे सड़क तक लाया और उससे कहा कि अब तुम उतर जाओ तो वह हंसते हुए बोली "पागल समझ रखा है क्या मुझे ? बड़ी मुश्किल से तो एक मुर्गा फंसा है आज और तुम कहते हो कि उसे ऐसे ही छोड़ दूं" ? उसकी तीखी हंसी मुझे अंदर तक हिला गई। मैं समझ गया कि मैं एक "आधुनिक डायन" के जाल में फंस चुका हूं। मैं फिर भी शांत रहा और सोचा कि देखते हैं कि आगे क्या होता है ? वैसे मेरी परवाह भी किसे है ? बच्चे अपनी मस्ती में मस्त हैं और पत्नी एक आत्म निर्भर औरत है इसलिए मेरी जरूरत किसी को नहीं है। 

इतने में उस लड़की के दो चार साथी जो पहले से ही वहां पर छुपे हुए थे , अचानक प्रकट हो गए और पूछने लगे "क्या हुआ मिस" ? 

"दिस मैन इज मोलेस्टिंग मी"। यह कहकर वह जोर जोर से रोने लगी। 

इतने में भीड़ इकठ्ठी हो गई। एक तो लड़की को देखकर वैसे ही भीड़ इकठ्ठी हो जाती है। उस पर रोती हुई लड़की हो तो बात ही क्या है ? तिस पर अंग्रेजी में गिट पिट करने वाली हो तो फिर तो भीड़ का आक्रोशित होना लाजिमी है। 

बिना मुझसे कोई सवाल जवाब किए लोग मुझ पर "दनादन" लात घूंसे बरसाने लगे। मैंने लाख सफाई दी कि मैं निर्दोष हूं पर मेरी बात सुनने वाला वहां कौन था ? जंतर मंतर पर बैठी पहलवानों की तरह उस लड़की ने भी गजब का ड्रामा किया। कुछ लोग मुझे पकड़कर एक गाड़ी में बैठाने लगे। साथ में वह लड़की भी बैठ गई। कुछ दूर चलने पर वह बोली "अभी भी मान जा , केवल दस लाख रुपए में मामला निपटा सकती हूं। अपने घर से बुला ले किसी को फोन से , नहीं तो सारा बुढापा जेल में ही कट जाएगा"। 

मैंने भी कभी जेल की रोटी नहीं खाई थी। मन में लोभ भी था जेल की रोटियां देखने का। इसलिए सोचा कि "बीवी भी तो जली कटी बातों के संग रोटी भी तो जली कटी ही खिलाती है। उससे ज्यादा बुरी तो नहीं होती होगी जेल की रोटी ? चलो, आज उन्हें भी आजमाते हैं"। 

मैंने कहा "मेरे पास तो धेला भी नहीं है इसलिए जो तुम्हें करना है वह कर लो"। वे लोग मुझे थाने ले गये और रिपोर्ट लिखा थी। थानेदार ने अंदर कर दिया और पचासों गालियां निकालता हुआ कहने लगा "इस उम्र में लड़की छेड़ते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती है ? पांच लाख दे दे तो छोड़ दूंगा नहीं तो पूरी जिंदगी जेल में ही सड़ेगा"। 

मैंने थोड़ी चैन की सांस ली कि मामला दस लाख से पांच लाख तक तो आ गया है। देखते हैं कि आगे क्या होता है ? इतने में एक वकील आ गया। कहने लगा कि एक लाख रुपए में छुड़वा देगा वह। उसकी सबसे सैटिंग है। मैंने सोचा कि मामला अब एक लाख तक आ गया है। हो सकता है कि कोई फ्री में ही छुड़वा दे ? आजकल नेता लोग फ्री में बहुत कुछ दे रहे हैं। हो सकता है कि कल को कोई नेता अपने घोषणा पत्र में लिखवा दे कि वे फ्री में जमानत दिलवाएगा। यह सोचकर मैं चुप ही रहा। 

तीनों लोगों (आधुनिक डायन, थानेदार और वकील) को जब कुछ नहीं मिला तो वे तीनों एक हो गये। वह लड़की अपने गिरोह के साथ जंतर मंतर पर "इंसाफ की लड़ाई " लड़ने के लिए धरने पर बैठ गई। उनकी एक ही मांग थी "ना कोर्ट ना गवाह। उन्होंने जो कह दिया वही सही है। मुझे तुरंत फांसी दे दी जानी चाहिए"। 

उनके समर्थन में समस्त लेफ्ट लिबरल्स, नारीवादी संगठन और तथाकथित आधुनिकतावादी आ गये। मीडिया मुझे दरिंदा सिद्ध करने के लिए चौबीसों घंटे डिबेट चलाने लगा। संसद में भी कोई "कऊआ चोइत्रा" और "गया खच्चन" टाइप की कुछ सांसद उनके समर्थन में दहाड़ें मार मार कर रोने लगीं। चूंकि मैंने गेरुए रंग की एक टी शर्ट पहन रखी थी इसलिए "भगवा बलात्कार वाद" की थ्यौरी तुरंत गढ़ दी गई और कोई "भहेश मट्ट" टाइप के फिल्म निर्माता ने "भगवा बलात्कार वाद" पर फिल्म बनाना भी शुरू कर दिया जिसमें कोई "दिया चक्रवर्ती" नाम की गुमनाम सी लड़की को हीरोइन के रूप में ले लिया गया। 

थानेदार को "कुछ" मिला नहीं इसलिए उसने अपना सारा नजला मुझे कूटने में गिरा दिया। ऐसी चार्ज शीट पेश की कि मेरी जमानत नहीं होने पाए। उधर वकील को भी कुछ नहीं मिला तो उसने भी कोर्ट में अपना प्रभाव दिखाते हुए मेरी जमानत की फाइल ही गायब करवा दी। जमानत तो तब हो जब फाइल मजिस्ट्रेट के सामने आए। एक पुरुष के अधिकारों की किसे चिंता है ? लोग तो यह मानते हैं कि औरत ने जो कह दिया वही पत्थर की लकीर है। पुरुष तो होते ही गुण्डे, भ्रष्ट हैं। उन्हें तो जेल में ही बंद रहने देना चाहिए। कोर्टों में तो वकीलों का राज चलता है। मजिस्ट्रेट भी इन वकीलों के आगे असहाय नजर आता है। 

मैं किसी "सपिल किब्बल" जैसे वकील को जानता नहीं हूं जिसकी सुप्रीम कोर्ट में चलती हो। ऐसे वकीलों से तो सुप्रीम कोर्ट भी डरता है। वैसे आजकल सुप्रीम कोर्ट के पास हमारे जैसे फालतू के केसों को सुनने के लिए वक्त ही कहां है ? आजकल तो सुप्रीम कोर्ट को "किसे उद्घाटन करना चाहिए, किसे माला पहनानी चाहिए" जैसे केसों को सुनने से ही फुरसत नहीं है। इसलिए हम भी चैन से जेल की रोटी खा रहे हैं। यहां पर ना तो बीवी की जली कटी सुनने को मिल रही है और ना ही अपनों की उपेक्षा झेलनी पड़ रही है। मेरे जैसे हजारों लोग इन "आधुनिक डायनों" के कारण जेल की हवा खा रहे हैं। ऐसे सभी पीड़ित लोग बड़े आराम से जेल की जिंदगी जी रहे हैं। भूले भटके अगर कोई मुझसे मिलने आ जाता है तो मैं उसे एक ही सलाह देता हूं "आधुनिक डायनों" से बचकर रहना , भैया। इसी में भलाई है"। लोग इस पर अमल भी कर रहे हैं। इससे मुझे जेल में ही शांति का अहसास हो रहा है। 


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