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रंजना उपाध्याय

Drama

3  

रंजना उपाध्याय

Drama

3 सहेली

3 सहेली

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तीन सहेली एक ही गाँव से सटे गाँव मे शादी हो जाती है। रोज शाम को तीनों एक ही समय पर निकलती है। भेंट मुलाकात करके फिर अपने अपने घर जाती है।इन सबकी दोस्ती बहुत ही गहरी होती गयी।तीनो सहेलियों के पैर भारी हुआ।कुछ माह आगे पीछे सब अपनी अपनी खुशखबरी एक दूसरे से बाटना शुरू कर दिया। समय पूरा होने पर तीनों को बेटा हुआ। तीनों अपने बच्चों का एक ही गाँव के प्राइमरी स्कूल में एडमीशन कराया। इस बहाने तीनो एक साथ स्कूल में मिलती थी।

थोड़ा बच्चे बडे हुए तो सबने एक दूसरे की इच्छा जानने की कोशिश की रीता अच्छा तुम बताओ बड़े होने पर अपने बच्चे को कैसे देखना चाहोगी। देखो सखियों मैं तो अपने बेटे को इंग्लिश मीडियम से पढ़ाऊंगी। एक अच्छा ऑफिसर के रूप में देखना चहूँगी। अब दूसरी सहेली का नम्बर आया। अच्छा मधु तुम बताओ। मेरा तो सीबीएसई से पढ़ाने की इच्छा है।बाकी ईश्वर क्या चाहेंगे।किसी को कुछ नही पता। सबने मिलकर तीसरे नम्बर पर पूछा अच्छा नीलम तुम बताओ। अरे मेरा क्या मेरे पास कोई आमदनी नहीं है तो तुम्हें पता है कि गाँव मे पढ़ाकर खेती करेगा।

अब सबके बच्चे पढ़ लिख कर जॉब करने लगे।

तीनों सहेली कलश स्थापना के लिए पानी भर रही थी।पानी की गगरी लेकर एक कोस की दूरी तय करनी थी। रीता का बेटा वहां से गुर रहा था। रीता ने बहुत ही गर्व से बताया कि देखो मेरा बेटा जा रहा है ।इंग्लिश मीडियम से पढ़कर आज एक ऑफिसर बन गया। बेटे ने पलटकर देखा बाकी के लोगों से नमस्ते किया और आगे निकल गया। अब दूसरे नम्बर पर मधु का बेटा आया।तो मधु ने भी बहुत ही खुश हुई ।और मुस्कुरा कर बताई। मैंने भी अपने कहे अनुसार पढा ले गयी। आज ओ भी अच्छी नौकरी कर रहा है। ओ भी देखा मुस्कुराया और आगे बढ़ गया। अब तीसरे नम्बर पर नीलम का बेटा आया और अपनी माँ के पास आया और बोला ये क्या कर रही हो। तुम्हारे बस की बात नही है कि एक कोस पानी की गगरी सर पर रख कर चल पाओगी। यह हमें दो हम एक कोस का फेरी लगाकर आपको वही मिलेंगे।आप वही पेड़ के नीचे बैठी रहना।सबने देखा और सबने सोचा कि हमने इतने अच्छे से अपने बेटों के परिचय दिया। और हमारे बच्चों ने पूछा भी नही।नीलम तुम बहुत भाग्यशाली हो। जो तुम्हे ऐसा बेटा मिला। बाकी के सखियों का चेहरा शर्म से मुरझा गया।नजरें शर्म से झुक गयी।

तो दोस्तों यह कहानी लिखने का एक मकसद था।कि आप सरकारी स्कूल में पढ़ाये। या प्राइवेट पैसों से संस्कार खरीदे नहीं जाते। चाहे सरकारी स्कूल में पढ़ें हो या प्राइवेट संस्कार तो हम सभी से बच्चे ग्रहण करते हैं।


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