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ashok kumar bhatnagar

Inspirational

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1971 युद्ध के पांच परम बीर

1971 युद्ध के पांच परम बीर

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    1971 के भारत-पाकिस्‍तान युद्ध के कई नायक रहे। थल सेना, नौसेना और वायुसेना के बेहतरीन कोऑर्डिनेशन का ही नतीजा था कि भारत ने अपने सैन्‍य इतिहास की सबसे बड़ी जीत हासिल की। एक नजर 1971 युद्ध के 5 परमवीरों पर डालते हैं। 


         (1) लांस नायक अल्‍बर्ट एक्‍का - परमवीर चक्र (मरणोपरांत)

झारखंड के गुमला की एक जनजाति से आने वाले एक्‍का गजब के शिकारी थे। 1971 की युद्ध में उन्‍होंने दुश्‍मनों का ऐसा शिकार किया कि रंगरूटों में आज भी चर्चे होते हैं। एक्‍का की तैनाती पूर्वी मोर्चे पर गंगासागर में थी। 3 दिसंबर को वहां भारतीय सैनिकों को भारी शेलिंग का सामना करना पड़ा। एक्‍का ने अपनी जान की बाजी लगाकर दुश्मन के बंकर पर हमला कर दिया। दो को यूं ही ढेर कर दिया और एक लाइट मशीन गन का मुंह बंद कर दिया। जख्म कई थे मगर एक्‍का लगातार बंकर खाली करने में जुटे रहे।

 

जब किसी इमारत से एक मीडियम मशीनगन ने आग उगलनी शुरू की तो एक्‍का ने उसपर ग्रेनेड फेंक दिया। उस हालत में भी वह दीवार चढ़कर ऊपर गए और फायरिंग कर रहे पाकिस्‍तानी सैनिक को मार गिराया गया। बाद में लांस नायक अल्‍बर्ट एक्‍का वीरगति को प्राप्‍त हुए। उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्‍च वीरता पुरस्‍कार परमवीर चक्र से नवाजा गया।

    

(2)फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों - परमवीर चक्र (मरणोपरांत)


लुधियाना में जन्मे सेखों कश्मीर घाटी की हवाई सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले श्रीनगर एयरबेस पर तैनात थे। सेखों और उनके साथी पायलट्स ने पाकिस्‍तानी एयरक्राफ्ट्स के बेड़े का डटकर सामना किया। 14 दिसंबर, 1971 को युद्ध का रुख मोड़ने की आखिरी कोशिश में पाकिस्‍तान ने श्रीनगर एयरफील्‍ड को निशाना बनाया। सेखों ने दुश्मन के एक एयरक्राफ्ट को निशाना बनाया और दूसरे को आग के हवाले कर दिया। मगर उनका Gnat विमान चार पाकिस्‍तानी विमानों से घिरा था।

 

        इसके बावजूद फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों ने चारों को उलझाए रखा। इसी दौरान उनका जेट दुर्घटनाग्रस्‍त हो गया और वह वीरगति को प्राप्‍त हुए। सेखों को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया। वह यह सम्‍मान पाने वाले एयरफोर्स के इकलौते अधिकारी हैं। 

     (3) 2nd लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल - परमवीर चक्र (मरणोपरांत)

17 पूना हॉर्स में कमिशन हुए अरुण खेत्रपाल की उम्र महज 21 साल थी। वह बसंतसर में थे जब भारतीय सैनिकों पर जरपाल में पाकिस्‍तानी रेजिमेंट ने 16 दिसंबर को हमला किया। स्‍क्‍वाड्रन कमांडर ने मदद मांगी और खेत्रपाल आ गए। उनका एक टैंक कमांडर शहीद हो गया मगर खेत्रपाल का रौद्र रूप जारी रहा। जब दुश्मन के टैंक पीछे हटने लगे तो खेत्रपाल ने उनका पीछा किया और एक टैंक बर्बाद कर दिया। दुश्मन ने दूसरा हमला किया मगर भारत ने सिर्फ 3 टैंकों से उन्हें रोके रखा, इनमें से एक टैंक पर खेत्रपाल सवार थे। उस जंग में 10 पाकिस्तानी टैंक बर्बाद हुए, जिनमें से 4 खेत्रपाल ने किए।

 

       इस पराक्रम के दौरान, खेत्रपाल का टैंक निशाना बन गया। वह जख्मी थे और उनसे कहा गया कि वे चले जाएं मगर वह लगातार दुश्मन से दो-दो हाथ करते रहे। उन्होंने एक और टैंक को तबाह किया मगर अगले हमले में उन्होंने सर्वस्व न्योछावर कर दिया। 

            

(4) कर्नल होशियार सिंह - परमवीर चक्र


सिंह की बटालियन, 3 ग्रेनेडियर्स को बसंतसर में एक पुल बनाने के निर्देश मिले थे। आमने-सामने की लड़ाई में सिंह के सैनिकों ने जरपाल पर कब्‍जा कर लिया। दुश्मन ने अगले दिन, 16 दिसंबर को 3 बार जवाबी हमला किए। सिंह एक खाई से दूसरी खाई में गए और लगातार अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे। 17 दिसंबर को पाकिस्‍तान ने फिर हमला किया।

 

सिंह की मशीन गन पोस्‍ट के पास एक शेल आकर गिरा जिसमें कई घायल हो गए। वह वह फौरन वहां पहुंचे और मशीन गन चलाने लगे। दुश्मन उल्‍टे पांव भाग खड़ा हुआ। बुरी तरह से जख्मी सिंह ने कहा कि वह मैदान छोड़कर नहीं जाएंगे, चाहे जो हो जाए। आखिरकार जब संघर्ष विराम का ऐलान हुआ, तब सिंह को अस्‍पताल पहुंचाया गया।

        

(5) सीमैन चिमन सिंह यादव - महावीर चक्र

सीमैन चिमन सिंह यादव उन जवानों में से एक थे जिन्‍हें मुक्ति वाहिनी को ट्रेनिंग देने का जिम्‍मा मिला था। 8 और 11 दिसंबर के बीच उन्‍होंने मोंगला और खुलना में किए गए ऑपरेशन में हिस्‍सा लिया। खुलना के पास उनकी नाव डूब गई और वह घायल हो गए। भारी फायरिंग के बीच वह अपनी पार्टी के दो लोगों को तट तक पहुंचाने में कामयाब रहे। फिर उन्‍होंने दुश्मन की तरफ दौड़ लगा दी ताकि उनके साथ भाग सकें। यादव को बंदी बना लिया गया। बांग्‍लादेश की स्‍वतंत्रता के बाद उन्‍हें अस्‍पताल में भर्ती कराया गया। तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी यादव को देखने अस्‍पताल पहुंची थीं।

 



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