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Shailendra Kumar Shukla, FRSC

Abstract

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Shailendra Kumar Shukla, FRSC

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ये क्यूँ सपना सा लगता है

ये क्यूँ सपना सा लगता है

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ये क्यूँ सपना सा लगता है 

तू क्यूँ अपना सा लगता है 

तुम आशा की दहलीज बनो 

ये सच् जपना सा लगता है !


मुश्किल तब तो होती है 

जब दूर मंजिल होती है 

तू भी हार नहीं सकता 

इतना ठाना सा लगता है !


मैं तो साथ सदा हूँ 

मैँ तो पास खडा हूँ 

घवराना क्यूँ सकुचाना 

ये तो माना सा लगता है !


मुद्धत हो जाये फिर भी 

अद्भुत हो जाये तब भी 

आफत की आंधी य़ा तूफां 

अपना, अपना सा लगता है !!


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