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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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ये जो बोल हैं

ये जो बोल हैं

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ये जो बोल हैं तुम्हारे

लिखे लिखे से

लगते भर हैं तुम्हारे

हैं नहीं तुम्हारे


और तुम भी कितने दिलचस्प हो

अपने का अपना कहने के

विपरीत मौन हो

तुम्हें तो पता है न

हम मौन को

अंदर से, अंदर तक सुनते हैं

और सुन रहे हैं


तुम्हारी हाँ, हाँ और हाँ

और देख रहे हैं तुम्हें

जकड़े हुये।

जो भी समझो हमें

ये बंधन तो खोल ही देंगे हम

अब ऐसी कोई रात नहीं है


जिसकी सुबह न हो

और बंद आंखों से

दिखना भी कहाँ बंद होता है

और मौन अनसुना

कहाँ रह जाता है।


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