ये गरीबी
ये गरीबी
खाने को देती नहीं दो वक्त की रोटी,
पीने को तरस जाते है पानी,
पहनने को देती नहींं कपड़ा,
रहने को नसीब नहीं होता है घर।
दर -दर पे ठोकर खाने को
छोड़ देती है ये गरीबी,
चाहे कितना भी तरस जाओ
कोई फरिश्ता भेजती नहीं है ये गरीबी,
ये गरीबी भी क्या चीज है।
दूसरों को अपना बना लेती है ये अमीरी,
लेकिन अपने को भी पराया कर देती है ये गरीबी,
अनुचित करने को मजबूर करती है ये गरीबी,
लेकिन समाज में उपर उठने को नहीं देती है ये गरीबी।
हम लोग नही समझ सकते इन गरीबों की भाषा,
क्योंकि की नहीं कोशिश हमने,
जानने की इन लोगों के मन की आशा,
ये गरीबी भी क्या चीज है।
जिंंदगी को जीने नहीं देती,
जिंदगी को काटने पर
मजबूर करती है ये गरीबी।
लोगों को अपने कंधों पर
ढोने को मजबूर करती,
ना चाहते हुए भी खुद को
चोट पहुंचाने को मजबूर
करती है ये गरीबी,
ये गरीबी भी क्या चीज है।
ठंडी हो या गर्मी हर मौसम की मार को
सहने को मजबूर करती है ये गरीबी,
बच्चे हो या बूढ़े किसी को वक्स्ती नहीं है ये गरीबी।
नहीं दे सकती खाना गरीबी,
उन गरीबों के बच्चों को क्योंकि
जिंदगी तो देती ही नहीं,
लेकिन जिंदगी छीन जरूर लेती है
ये गरीबी, ये गरीबी भी क्या चीज है।
