चिड़ियाँ और मैं
चिड़ियाँ और मैं
हमेशा चहचहाती थी चिड़िया, जब मैं छत पे आती थी,
जाने कैसे गाती थी, हर रोज नया राग सुनाती थी।
था नहीं घमंड उसको , अपने सुंदर गाने पर ,
बिंदास होकर गाती थी वो, जब मैं छत पे आती थी।।
हमेशा दाना चुगने आती थी , मेरे छत के मुंडेर पर,
बैठी तो ऐसी रहती थी , जैसे राजगद्दी पर ।
मेरे छत के मुडेरे पर , रोज सुबह आ जाती थी
बिंंदास होकर गाती थी वो , जब मैं छत पे आती थी।।
रोज सुबह इंतजार करती वो, मेरे छत पे आने की,
गाना तो ऐसा गाती थी, जैसे लतामंगेसकर की जुवानी सी।
रोज नया संदेशा लेकर,आती थी मेरे छत के मुडेरै पर,
बिंंदास होकर गाती थी वो , जब मैं छत पे आती थी।।
सबका मन मोह लेती थी , अपने सुंदर गानों से,
पता नहीं था हमको, प्राकृति ने इतना सुंंदर गायिका बनाया है।
दिवानी सी वो गाती थी , सूरज की सुंदर लाली मे,
बिंदास होकर गाती थी वो , जब मैं छत पे आती थी।।
