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Rajant Kandulna

Abstract Fantasy

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Rajant Kandulna

Abstract Fantasy

यौवन

यौवन

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यह कैसे यौवन,

      मुश्किल है समझ पाना

जग - जहान के भ्रमण से,

         देह बहुतेरे बोझिल है

संसार के अजीब पूर्ण विचारों से,

        अजब ऐंठन होती है

 आंतरिक हृदय वीरान है

        बहेतु संसार का घूर्णन

          यह अजीबो यौवन।


संसार के उस अजीब चौराहे में,

          परिवार सारा ढह गया

बहुरूपिया गतिमान तीर का

               जाने क्या सर है

बेपीर व्यथा दिखती नहीं,

     यामिनी बिताए उषा की जोहते हैं

निद्रा गायब हो जाती, भोर नहीं

            यह अजीबो यौवन।


पगरा डोल रहा है,

       भार सहित चितवाल

किस कोने में नेता मिला है,

         भटके  नेवतहर

अपरिचित इस बख़्तर से,

       जकड़ा देह बंदनवार

काँटों की राह में सहिष्णु पथिक

         यह जादू - सा यजमान

         यह अजीबो यौवन।


धूलों पर छाप मारते हुए

       बेमेल असीम इच्छा की खोज में

बेबसी से सूर्य - दर्द का बेफिक्र

         बुलंद जोश में सहता है

रेगिस्तानी रेत में घूमता हुआ

         मृगतृष्णा सवारी चलता है

महाभीरु का निडरता,

          माही कम्पन, घुली तूफान

          यह अजीबो यौवन।


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