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Bhavna Thaker

Abstract

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Bhavna Thaker

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यादों की पुरवाई

यादों की पुरवाई

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आई होली लाई कितनी 

यादों की पुरवाई 

तुम क्या रुठे फागुन रुठा 

टेशू के रंग फ़िके

बेरंगी है सारे मौसम 

रंग ना कोई भावे

सुहागिन सब खेल रही

मैं देखूँ दूर खड़ी ही


कितने हसीं थे सारे मौसम

यादों में अब रह गये

लाल उदासीन 

नीले गम है

हरी चूड़ियाँ रोएँ 

लोचन मांहि खेले

तन चिंथडे मेरे शहीद के

मेरी पुतलीयों को घेरे 


ठहर गये मेरे सारे लम्हें

शान ए तिरंगा मेरे

होली दिवाली चली गई

संग तुम्हारे प्यारे

झोली में मेरी पड़े हुए है

अब आँसू के ठेले 


जला दिये सुख सारे अपने 

माँ वतन की साँसें 

कभी ना रुकने पाएँ 

ज़िंदगी ही अब ठिठक गई

खुशियों की दहलीज़ पे

कैसा फागुन, कैसी होली 


बेरंगी बेनूर हर लम्हें

शहीद की दुल्हन के अब तो 

सारे दिन है एक से।


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