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तृप्ति वर्मा “अंतस”

Abstract

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तृप्ति वर्मा “अंतस”

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यादें

यादें

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कुछ अनजानी-सी लगती है

हर बात नयी-सी लगती है

जब बैठे होते है हम

दूर कहीं अपनों से।


कुछ होते हैं जाने पहचाने चेहरे

पर वो अपने से नहीं होते

नहीं होती उनमें वो गर्माहट रिश्तों की

नहीं होती उनमें वो सुगबुगाहट-सी

जो दे आराम तन-मन को।


वो होते हैं दिखने में अपने से

पर वो होते हैं दिखावे की तरह।

जो दबा देते हैं हमको

हमको एहसानो के किसी ढेर में।


जिससे उबरने के लिए हम

करते हैं एक और दिखावा।

और अपने पर पड़े एहसानो के ढेर से

मुट्ठिया भर-भर कर

उसे वापिस उसी जगह डालने लग जाते हैं।


ऐसे में वो स्थान भी परेशान-सा हो जाता है

उसके लिए उसका सामान ही

पराया-सा बन जाता है।

और यहीं से शुरू होता है

दिखावो का एक खेल सा।


जो चलता रहता है कभी-कभी जीवनपर्यन्त

कभी-कभी हम उस खेल से उकता जाते हैं।

और अपनों की यादों में बहे चले जाते हैं

चाहते हैं तो सिर्फ उनका साथ

अपने सर पर उनका हाथ।


तब हमें वो पल याद आते हैं

जो हमने थे साथ बिताए।

बस एक ही तमन्ना होती है दिल में

कि वो अपने हमें मिल जाएं 

और मिल जाए उनका स्नेहाशीष।


लेकिन ये वो समय है

जो हमें बहुत कुछ सिखाता है। 

जीवन जीने के काबिल हमें बनाता है।

देता है हमें एक नयी जीवनी शक्ति

जो करती है हम में एक नयी ऊर्जा का संचार।


कुछ लोग होते हैं जो

इन यादों की मारो से मर जाते हैं 

और कुछ इनके सहारे अजर बन जाते हैं।

फिर क्यों हम इस यादों के समंदर में

अपनी कश्ती को डुबोएं ?


आओ हम भी इन यादों की नींव पे

सपनों का एक महल संजोये।


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