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Nikhil Kumkum

Abstract


5.0  

Nikhil Kumkum

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वरदान

वरदान

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शीश झुका कर,

हाथ जुड़ा कर 

आँखें कर ली नीचे मैंने 

अब कर दो क्षमा हमें


जो गलती की हो मैंने

ना मन बस इतना वरदान दिला दो 

मेरे जीवन की तस्वीरों की स्याही पर 

मेरा भी अधिकार दिला दो

 

कुछ रंग लिखूंगा,

पलकों की पट पर 

एक आधा सपना रंगीन बना दो 

मेरी दुनिया के दर्पण से 

मेरा भी एक रंग सिला दो 

 

बस इतना वरदान दिला दो

मेरे जीवन के तस्वीरों की 

स्याही पर मेरा भी अधिकार दिला दो 

 

सपना है सुबहों की किरणों का 

कुछ महकों का, कुछ रंगों का 

एक महक खिलेगा, मलमल कुर्ते पर 

एक रंग सजेगा विजयी मस्तक पर

 

बस इतना वरदान दिला दो

मेरे जीवन के तस्वीरों की 

स्याही पर मेरा भी अधिकार दिला दो

बस इतना वरदान दिला दो।


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