वक़्त
वक़्त
वक़्त भी अज़ीब है ना दोस्तों ,
सदैव एक सा नहीं रहता है।
किसी को पन्नो पर छपवाता है,
तो किसी को धूल में मिला जाता है।
खामोश होते हुए भी,
बहुत शोर करवाता है।
किसी के न चाहते हुए भी,
यह अपने मन की कर जाता है।
वक़्त ही है जो वक़्त पर,
अपनो की पहचान करवाता है।
बेगुनाह होने पर भी,
गुनहगार साबित करवाता है।
इसे कोई नही पकड़ सकता है,
किन्तु यह हर एक को जकड़ सकता है।
वक़्त को वक़्त नही लगता तख्ती पलटने में,
राजा को रंक, और रंक से राजा बनाने में।
