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सागर जी

Abstract

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सागर जी

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वो जो हवा है ना

वो जो हवा है ना

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आज, रात शांत है, मन व्याकुल क्यों,

क्या ? बाहर की आंधी, अंदर आ गई है।

बाहर का अंदर और अंदर का बाहर,

वो क्या उड़ा ले गई है ?


पूछो तो उससे, वो उसे क्या चाहिए था,

जो मुझसे, छीनकर ले गई है,

रहने दो उसे, उसे वो ले जाने दो,

वो जो उड़ाकर ले गई है।


पहले, मैंने जानना चाहा,

कुछ समझ नहीं आया, ऐसा क्यों हुआ।

पर मेरे पास है क्या, वो जो

चुराकर ले गई है।


समझा था, मैंने स्वयं को अकिंचन,

पर वो कुछ तो, मनाकर ले गई है।

आजकल तो, न विचार आते हैं,

न ही कलम चलती है मेरी।


एक कसमसाहट, रहती तो है मन में,

पर शब्दों में उतर नहीं पाती।

वो जो हवा है न, कदाचित

मेरे इस साथी को ही

भगाकर ले गई है।


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