वो एक माँ ठहरी
वो एक माँ ठहरी
हर घर में बुजुर्गों का सम्मान नहीं होता पर ये सच है कि।
"बच्चे हो या बूढ़े ,प्यार की ज़रूरत सबको होती है।"
अभिषेक ने माँ की साड़ी की प्लेटस को नीचे
झुककऱ ठीक करते हुए उनकी बात के ज़वाब में कहा, जब अभिषेक ने साड़ी के साथ मैचिंग पर्स माँ
को पकड़ाते हुए प्यार से माँ के गाल पर हाथ फेरा था और माँ ने उसे प्यार से झिड़कते हुए कहा था,
"रहने दे बेटा, अब इस बुढ़ापे में मुझ बुढ़िया पर क्या प्यार लुटा रहा है।"
"आज सब मिलकर बाहर जायेंगे।"
दोनों बच्चे भी बोल बोलकर ख़ुश हो रहे थे।तो उनको ख़ुश देख अभिषेक और अनीता भी मुस्कुरा रहे थे।अभिषेक और बच्चों ने तब ज़बरदस्ती आग्रह करके अपने दादा दादी अर्थात अभिषेक के माँ पिताजी को भी करके अपने साथ ले लिया था।
आज लॉकडाउन के बाद पहली बार पूरा परिवार लंच के लिए बाहर आया था। रिद्धि और राहुल दोनों बच्चे पहले ही सोच चुके थे कि वो इटालियन खाएंगे।
इसलिए अनिता ने दोनों बच्चों को अभिषेक के साथ डोमिनोज़ में भेज दिया और खुद पिताजी और माँ को लेकर एक रेस्टोरेंट में शुद्ध शाकाहारी भोजन के लिए आ गई। वहाँ ज़्यादा भीड़ नहीं थी इसलिए पीछेवाले बड़े टेबल पर सब बैठ गए और अनीता वेटर को खाने का आर्डर देने लगी।
माँ जी ने एक बार दबी ज़ुबान से कहा भी कि, "यूँ बच्चों को अलग भेजने की ज़रूरत क्या थी,
सब साथ में ही खा लेते।"
तो अनीता ने उन्हें समझाते हुए कहा,
"माँजी, बच्चे बहुत दिन बाद घर से बाहर आए हैँ।उन्हें अपनी पसंद का पिज़्ज़ा खाना था, इसलिए वो अपने फेवरिट जगह गए और हम इधर आ गए। अब इस उम्र में आप लोगों को वो सब खाना थोड़ी ना डाइजेस्ट होगा।।"
"सही कह रही हो बहू !
पिताजी ने एक दीर्घ निःश्वास लेकर कहा। हम अब बूढ़े हो चुके हैँ। हमें अब मन मारकर जीना ही पड़ेगा!"
थोड़ा दर्द और बेचारगी थी उनकी आवाज़ में जिसे अनीता ने महसूस किया हो या ना किया हो उनकी पत्नी कल्याणीजी ने ज़रूर महसूस कर लिया था। तभी वेटर उनका ऑर्डर दे गया और अनीता आगे बढ़कर उन्हें सर्व करने लगी। दोनों चुपचाप खाते हुए सोच रहे थे, यूँ जब अलग अलग खाना था तो
घर से बाहर आए ही क्यूँ। घर पर ही रहते।
अभिषेक भी पता नहीं कब आएगा। वो दोनों अपनी इस पढ़लिखी और दबंग बहू के सामने अक्सर ज़्यादा कुछ बोल नहीं पाते थे। दोनों बस जैसे तैसे खा रहे थे कि तभी वो चौंक गए,
सामने से दोनों बच्चे और अभिषेक हाथ में पिज़्ज़ा के पैकेट्स पकड़कर आ रहे थे। आते ही अभिषेक ने कहा, "बच्चे ज़िद कर रहे थे सब साथ मिलकर खाएंगे, भले दादा दादी थोड़ा सा ही खाएंगे पर सब साथ साथ खाएंगे।
"और नहीं तो क्या, बच्चों के दादाजी ने ख़ुश होते कहा। आखिर परिवार के साथ ही तो प्यार का एहसास होता है।"
आखिर वो एक माँ ठहरी। वह तो वह तो प्यार करेगी ही।
"और बच्चे हो या बूढ़े, प्यार की ज़रूरत तो सबको होती है।" अभिषेक ने उनकी बात के सिरे को आगे बढ़ाते हुए कहा।
सब मिलकर इंडियन, इटालियन फ़ूड का मज़ा ले रहे थे और खाने का स्वाद बहुत बढ़ गया था उसमें प्यार का स्वाद भी तो मिल गया था। अभिषेक और अनीता देख रहे थे कि उन्हें भी पसंद था यह सब खाना भले थोड़ा ही सही।
आज वहाँ अपनेपन की खुशबू फ़ैल रही थी और पूरा परिवार खुश था। हो भी क्यूँ ना। प्यार की मज़बूत डोर से बंधे थे सब। आखिर प्यार की ज़रूरत तो सबको होती है ना।
