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Prashant Bebaar

Abstract


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Prashant Bebaar

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वक़्त ठहरता नहीं

वक़्त ठहरता नहीं

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वक़्त ठहरता नहीं

वक़्त बदलता नहीं

बस बहता है मुसलसल

एक दरिया की तरह


बहते बहते उतरता है

तमाम ज़िन्दगानी में

कहीं उथला, कहीं गहरा

कहीं किनारों में बँधा

कहीं हद है दूर, नज़र नहीं जाती

कहीं लम्हे कम, लहर नहीं आती

वक़्त बदलता नहीं

फ़क़त किनारे बदलते हैं

हालात बदलते हैं

नज़ारे बदलते हैं

वक़्त बहता है मुसलसल

एक दरिया की तरह।


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