वक्त बादशाह (गजल)
वक्त बादशाह (गजल)
समझ न सका वक्त-वक्त के इशारे, डूब गया उलझनों में, लोग लगते गए किनारे।
न समझ रहा, अभी तक
उम्र गुजर गई सारी, समझ रहा था जिन्हें अपने अभी तक न हुए हमारे।
दास्ताँ हो गई गंभीर इतनी, किस किस को सुनाता, जिसे पूछा परेशान ही मिला, डूबे मिले गमों में सारे।
दिन गुजरते गए उलझन बन कर, रातें गुजरी गिनते सितारे, न चाँद दिखा मस्ती में ना गिनती में आए सितारे।
प्रयास जारी रखा की कश्ती लगे किनारे, वोही मल्लाह, वोही दरिया था पार कर दिए मंझधार भी सारे।
बढ़त किनारे की जारी रखी, दे देके चप्पू के सहारे, अजब तमाशा
देखने को मिला, पीछे धकेल रहे थे अपने ही सारे।
जोश, होश कभी नहीं खोया, वागडोर दे दी
प्रभु के सहारे, डूबना होगा डूबो देगा, अब
हार-जीत है उसके सहारे।
कर्मों का फल, मिल कर रहेगा, तू क्यों बाजी हारे,
समय के संग चलता चल
फिर देख वक्त के नजारे।
गुजरा हुआ याद न कर
जो मिला उसे क्यों उजाड़े,
आने वाला कल
तेरा होगा सुदर्शन, जब
वर्तमान तू सुधारे।
