STORYMIRROR

गुलशन खम्हारी प्रद्युम्न

Abstract Inspirational

4  

गुलशन खम्हारी प्रद्युम्न

Abstract Inspirational

वीर नारायण सिंह...आल्हा छंद

वीर नारायण सिंह...आल्हा छंद

1 min
221

कर उपकार जमींदार हुए, थे वो नारायण बल वीर।

जनजाति दिलों में बसते थे, गॉंव-गली जा हरते पीर।।

गोरे निशिदिन शोषण करते, देते केवल सबको त्राण।

  जन मन हित की रक्षा खातिर, त्याग दिये वो हॅंसकर प्राण।।


सोनाखान गहे जो गाथा, उसको कोई राजा मान।

अट्ठारह सौ सन्तावन में, अंग्रेजों की अटकी जान।।

राज्य टकोली का रोध किया, भीषण सूखा आया एक।

गोदाम सभी लूट लिया वो, कर्म किया भूखों में नेक।।


भंडारों के ताले टूटे, था व्यापारी माखन‌ ढीठ।

स्मिथ सम्मुख आज श्रृगालों के, सिंह नहीं करता था पीठ।।

जब संबलपुर में कैद हुए, लेकर भागे साथी तीन।

सैनिक ले सौ पॉंच चले वो, जैसे अर्जुन रण आसीन।।


मुश्किल नित-नित बढ़ता जाए, जैसे कर से निकले मीन।

गोरे दौड़े भागे खोजे, आरोप लगा फिर संगीन।।

 मास दिसंबर दस होत सजा, धीरे-धीरे चल शालीन।

 मानो कोई सिंह चला था, गौरव मरणी पथ रंगीन।।


अंग्रेजों की सत्ता बढ़ती, तन में जैसे बन कोकीन।

साहस करता कौन भला तब, हथकंडे थे हाय नवीन।।

एक अकेला शेर हमारा, खोजो उसके समकालीन।

जिसने हॅंसकर फाॅंसी झूला, वह इतिहास सुनो प्राचीन।।


भक्त वही भारत का ऐसा, था रज-रज से वह तल्लीन।

निज को न्योछावर स्वयं किया, मौत नहीं जो होत हसीन।।

जान शहीद प्रथम उसको ही, लड़ता था जो शान्ति विहीन।

कैसे-कैसे दुख आए थे, जिसने देखा अंत दुखीन।।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract