विडंबना
विडंबना
अजीब है यह विडंबना भी दिल कुछ कहना चाहे मगर कह ना पाए।
क्योंकि विडंबना है ऐसी कि कहे तो सामने वाला नाराज हो जाए।
जिंदगी है तो विडंबनाओं का होना भी स्वाभाविक है।
कभी हमको जिंदगी में ऐसा सामना करना पड़ता है,
कि हम सही होते हुए भी अपनी बात ना समझा पाए।
सही समय पर हमारी परेशानियों के कारण हम किसी प्रसंग में ना पहुंच पाए।
अपना परेशानी ना बता पाए ऐसी विडंबना होती है।
रिश्ते भी खटाई में पड़ जाते हैं।
जो समझाने पर जुड़ तो जाते हैं मगर गांठ पड़ जाती है।
हमने जिंदगी में बहुत सामना किया है इन विडंबनाओं का कोरोना काल में।
नहीं आने दिया लोगों को घर में भले कितने भी खास थे वो
समझाने पर समझ गए तो अच्छी बात है ।
ना समझे तो रिश्ते तोड़ गए और क्या हो सकता है ।
सच्चे रिश्ते ऐसे नहीं होते जो थोड़ी सी विडंबना के कारण टूट जाए।
जिंदगी में सच हमेशा कड़वा होता है।
अगर कहते हैं तो सामने वाले को बुरा लगता है।
और हमारी विडंबना यह है यह हम सामने वाले को बुरा नहीं लगवा सकते हैं
इसीलिए चुप रहने में ही भलाई मानते हैं ।
अपनी बात को दूसरी तरह से कहने में ही भलाई मानते हैं।
कहते जरूर है दिल में नहीं रखते है क्योंकि दिल में भी बातें नासूर बन जाती है ।
मगर समय परिस्थिति देख दिल की बात कह देते हैं और दिल की भड़ास निकाल ही देते हैं।
फिर हम उसके अंजाम की परवाह नहीं करते है।
थोड़ी फाइट हो मगर दिल तो हल्का हो जाता है
नहीं कहने की विडंबना में से छूट कर एकदम हल्का हो जाता है।
