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Lipi Sahoo

Abstract

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Lipi Sahoo

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वाह रे ! जिंदगी

वाह रे ! जिंदगी

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ये जिन्देगी है

कोई भयानक मंजर नहीं

कहां गुम हुआ एतबार

अबिश्वास की दल दल में

फंसता ही जा रहा


चारों तरफ

कितनी भीड़ भड़का सोर है

फिर भी कुछ असमंजस बातों का

गूंज चारों ओर फैल ही जाती है

पल में दंगा फसाद और


आग के चपेट में पूरा सहर

घर से निकलने में 

डर तो लगता ही है

यहां जिंदगी का कोई भरोसा नहीं

कहीं लाश बन के ना लौट आए

हरीआली के जगा बारूद के ढेर


नज़र आते हैं

कुदरत का बदलते रंग देख

हैरान है सभी

एक अरसा हो गया

उमड़ती हुई घटाओं में

वो उमंग ही नहीं


अब बारिश के बुन्दे

सिर्फ शैलाब ही लाती है

तपतपाती हावा एकदम गुमसुम

कब आंन्धी बन 

केहर मचा दे पता नहीं


जिंदगी बाजार बन के रह गया

प्यार बिकते तो थे ही

अब आंसुओं की कीमत 

लगाई जाने लगी


लोग मुस्कुराने की वजा

तलाश ने की नाकामीयाब कोशिशों में

मुठ्ठी भर ग़म दबोचे बैठे हैं

अब तो जिंदगी सिर्फ 

हथेली से फिसलता हुआ

रेत बनकर रह गया।


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