उम्मीदें....
उम्मीदें....
पैदा होते ही जिन्देगी के सफर शुरु होते,
तब हम रोते और बाकी सब तो हंसते.
तब हमें क्या पता दूसरे क्या सोचा करते?
नए सपनो के साथ कुछ उम्मीदें जागती .
बचपन मे पिता माता के उम्मीदें तो होते,
उसमे खरा उतरने की कोशिश करते.
उनकी ऊँगली पकड़ के चलना सीखते,
फिर समय के साथ अकेला चल पड़ते.
कभी कभी डर भी जाते है, सहारा ढूँढ़ते,
फिर नयी उम्मीदों के साथ तो आगे बढ़ते.
चलते चलते ये शरीर कभी थक जाते,
पर ये उम्मीदें तो कभी थका नहीं करती .
वो तो आगे बढ़ने की नयी जोश ही भरते,
तब तो, उम्मीदें है तो जिन्देगी है ही कहते........
बढ़ते बढ़ते और थोड़ा आगे ही बढ़ते,
कुछ अपने सोच,सपने बदल ही जाते.
जवानी का नशा और जोश ब्यस्त कर देते,
उसमे कुछ हम गलतियां कर बैठते.
फिर नयी उम्मीदों के साथ तो आगे बढ़ते,
फिर खुद को सँभालने की कोशिश करते.
कभी कामयाब होते, कभी नाकाम भी होते,
तब ये उम्मीदें ही नयी सपने ही दिखाते.
जब अनजाने मे कभी ये दिल दे बैठते,
और किसी से हम प्यार ही करने लगते.
जब कभी वो प्यार हमसे ही दूर हो जाता,
मन उदास होता और ये दिल टूट जाता.
और हम अपने रास्ते नजाने भूल जाते,
तब, उम्मीदें है तो जिन्देगी है रास्ता दिखाते..........
समय के साथ साथ ये उम्र बढ़ती जाती ,
संसार के बन्धन मे जिन्देगी बंध ही जाती .
मोह माया की जाल मे फिर हम फस जाते,
बीते हुए काल को छोड़, आगे ही तो बढ़ते.
देखते देखते हम पिता माता बन जाते,
बच्चों के साथ नयी जिन्देगी शुरू करते.
हम भी उनपे कुछ उम्मीदें लगा बैठते,
कुछ पूरे होते और कुछ अधूरे रहेते.
बच्चे भी बड़े होते और वो आगे बढ़ जाते,
उनकी सपने और मंजिल अलग होते.
धीरे धीरे हमसे बहुत दूर चले जाते,
उनकी नयी दुनिया की वो शुरु भी करते.
तब हम ना जाने कियूं अकेला रहे जाते,
और उम्मीद है तो जिन्दगी है सोचा करते ......
