प्रकृति के नियमों के विपरीत एक काल्पनिक और मजेदार बाल-कविता।
चूहे को गुर्राते देखा, बिल्ली को चिचियाते देखा,Subah-subah ye kya-kya देखा, सब कुछ देखा उलटा-पुलटा!गिरगिट को रंग बदलते देखा, कुत्ते को दहाड़ते देखा,शेर को भी भौंकते देखा, आया देखो घोर कलयुग भाई!
चींटी हाथी को खींच रही,मछली पेड़ पर नाच रही,सूरज निकला रात के काले,Chanda mama dhoop nikale.रीछ लगा है बुनने स्वेटर,मेंढक गाए सुरीला लैक्चर,चूहा बिल्ली को डरा रहा,बकरी को भेड़िया बचा रहा।कछुआ दौड़े सुपर फ़ास्ट,चीता पीछे छूटा लास्ट,भालू जी अब चश्मा लगाकर,अख़बार पढ़ रहे कुर्सी पर।मच्छर गाए राग मल्हार,हाथी जी करते श्रृंगार,घोड़ा बैठा कार के अंदर,ड्राइविंग सीख रहा है बंदर।लोमड़ी भूली अपनी चालाकी,कौवे ने गायी कव्वाली बाकी,गधे के सिर पर सींग उगे हैं,उल्लू दिन में जाग रहे हैं।सांप को चूहे ने डसा है,नेवला डरकर दूर भगा है,भैंस उड़ रही आसमान में,चिड़िया बैठी दुकान में।मुरगा बोले आधी रात,सुनकर चौंके सारे साथ,पानी में अब आग लगी है,बर्फ़ की नदी आज बही है,कैसा आया घोर कलयुग भाई,जिसने देखी हँसी उड़ाई! [ संदीप सुमन]