थकान के दो रंग
थकान के दो रंग
एक धूप में पिघल रहा, सिक्कों की खनक कमाने को,
एक चौके में झुलस रही, बस एक थाली सजाने को।
दोनों की आँखों में देखो, एक जैसा ही पानी है,
एक ज़िम्मेदारी निभा रहा, एक त्याग की अमर कहानी है।
वह तपती सड़कों पर चलकर, पाँव के छाले लाता है,
यह जलते तवे के आगे रह, उँगलियों को झुलसाती है।
तुम कैसे कहोगे किसका दर्द, दूजे के दर्द से भारी है?
एक ढाल बना है आँधी में, एक आँचल में दुनिया सारी है।
वह थककर जब घर आता है, तो अपनी थकन छुपाता है,
यह दिनभर चक्की सी पिसकर, भी मुस्कान लुटाती है।
रोटी कमाना भी है तपस्या, रोटी बनाना भी एक साधना,
इन दोनों के ही दम से पूरी, होती हर घर की आराधना।
संदीप कुमार सुमन
