बेबसी
बेबसी
वक़्त ने दिए जो तोहफे, वो अश्कों में बदल आए।
इंसान के जज्बातों को, हालात दबा देते हैं,
हम हंसना चाहें भी तो, ग़म चेहरा मिटा देते हैं।
गैरों के आशियाने में, दिन-रात जागता रहा।
दूसरों के बच्चों का तो, हर फर्ज निभाया मैंने,
पर अपने ही बच्चों का, बचपन गंवाया मैंने।
नजरें चुराकर खुद से, अंदर ही अंदर रोता हूं।
ध्यान ना दे पाया उनपर, जब उनको जरूरत थी,
मेरी हर कोशिश शायद, हालात से मजबूर थी।
जो खुशियां बची थीं दिल में, वो धूप में पिघल गई हैं।
पर दिल से एक ही दुआ, अब हर पल निकल रही है,
काश लौट आए वो बचपन, जिसकी याद तड़प रही है।
'सुमन' की महक से महके आँगन, बस यही प्यास बाकी है।
