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M Tiwari

Tragedy Classics Thriller

4  

M Tiwari

Tragedy Classics Thriller

उदाशियों का जंगल

उदाशियों का जंगल

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मन मेरा जीवन के उदाशियों
और लाचारियों के जंगल में
ना जाने क्यों भटक रहा है ,
दिल बेचारा भावनाओं के
घने अंधेरे पेड़ों के नीचे तड़प रहा है  
सोचूं भी क्या! मैं जो मेरे जज्बातों को खत्म कर दे  डरता है दिल की कही वो शब्दों में गुम हो  ना जाए ,   डरती हूं मैं मेरे सपनो के गुलाबों से भरे बगीचो में कही कोई अनहोनी का तुफ़ान न आ जाए
मैं अपने आप से दूर होकर तूफान से टकरा के
किसी और किनारे  पे ना  चली जाऊ,
अगर मेरी कोई  कोई परछाई न हो तो
 मैं कैसे  खुद को सार्थक कर  पाऊंगी ?
अगर मैं पूर्ण होकर भी पूर्ण  न हुई तो  
 मेरा  जीवन का एक हिस्सा हमेशा
एक अंधकारमय बदलो से घिरा  रहेगा
जो भी होना चाहिए वो क्यों होता नहीं है 
अगर बर्बाद ही होना है तो क्यों जल्दी होता भी नहीं है 
मेरा अंतर्मन एक  सड़क की तरह है
जो बस दूसरों की मंजिले तक ले आती है 
अफसोस उसकी अपनी मंजिल कभी नहीं मिलती है
 


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