सबक जिंदगी की
सबक जिंदगी की
नसीबो ने क्या आज दिन मुझे दिखाया है
लाचारी और बेबसी की क्या सबक सिखाया है
गमों का गहना पहन मैं दर्द की अलग महफिल लगायी हूं
सपनो के घरौंदो को मिटाकर कर्तव्यों का घर बसायी हूं
अपनो की खुशियों की जंजीर पहन मै अपने विचारों को
कैद कर उनके सपनो का आशियां बना रही हूं
हताशा की परछाई हर वक्त मुझे डराने की कोशिश कर रही है
छोटी सी आशा आकर मुझे डर से रोकने की कोशिश कर रही हैं
मोह की डोर टूटने की कगार पे आकर दिल पे इक बोझ बना रही है
दिल दिमाग दोनों ही एकदुसरे से दुश्मनी निभा रहे है
वक्त ने कुछ ऐसा आज हमें मंजर दिखाया है
खुद को असलियत का एक आईना दिखाया है
पत्थर सी हो गई ही है दिल की ये अधूरी हसरतें
ऊबन सी हो गई है अपने हे विचारों से
बर्बादियों ने आकर क्या मुझे पे क्या कहर लाई है
खुशियों ने मुझे से क्या दुश्मनी निभाई है
अपनो ने आज मुझे अपनी औकात की बात सिखाई है जिन्दगी है तो जीने की कोशिश ये बात मैने आज खुद को बताई है।
