क्यों??
क्यों??
बेचैन जिंदगी क्यों हैं
क्यों है दिल मायूस
क्यों नहीं है सकून
क्यों है मजबूरियों के तार
खुशियों क्यों नहीं है पास
क्यों ही खालीपन का उबलता हुआ तेजाब
पास क्यों है बेबसी की बौछार
क्यों गायब है उम्मीदों की बात
क्यों नहीं आते अब आंखों में
खुशियों के कुछ बूंद आंसुओं के
नाकामी ही क्यों आती हैं सबके सामने
जज्बातों का घर क्यों बना है खंडहर
क्यों दर्द पीड़ाओं का बस मिलता है इल्जाम
रोने का क्यों दिल नहीं कर सकता है कोशिशें
जिंदगी क्यों जिंदा रहते ही मौत का मंजर दिखा रही हैं
क्यों अपने खुद अपने को नीचा दिखा रहे हैं
क्यों तमन्नाएं अपना बिकराल रुप बना रही हैं
ख्वाहिशे क्यों खुद को रुला रही है
क्यों दिल पत्थर को परछाई भी आ रहा है
मुस्कराने से क्यों ये चेहरे अब खुद हे डर रहे हैं
क्यों सपने मिटा रहे है खुदको आप ने ही बातों से
क्यों क्यों क्यों हम इंसानियत को भुला रहे हैं ।
