तू कौन है मेरे लिए?
तू कौन है मेरे लिए?
"तू कौन है मेरे लिए?"
कहाँ से लाऊँ इतना सब्र,
कि तू बात न करे और मुझे फर्क न पड़े।
चाहता हूँ खुद से भी,
कि ना मैं कॉल करूँ, ना कोई मैसेज भेजूँ।
पर तेरी फ़िक्र…
खींच ही लाती है तुझ तक।
ना चाहते हुए भी,
तेरे नाम से उँगलियाँ मोबाइल तक चली ही जाती हैं।
मेरे जीवन में सबसे ऊँचा स्थान तो
मैं किसी और को नहीं दे सकता,
क्योंकि वो स्थान उस इंसान का है
जिससे मैं जन्मा हूँ—
जिसका मैं अंश हूँ, पहचान हूँ।
तू कौन है?
कहाँ से आई है?
क्यों आई है मेरी ज़िंदगी में?
कब तक रहेगी—ये भी नहीं पता।
पर इतना ज़रूर जानता हूँ,
कि जब तू पास होती है,
तो सुकून मिलता है।
ना खून का रिश्ता है,
ना कोई नाम दिया गया है इस रिश्ते को—
फिर भी… तू खास लगती है।
कुछ ही समय हुए हैं तुझे जानते,
पर एहसास ऐसा…
जैसे बरसों की पहचान हो।
जब भी सोचता हूँ कि तू नहीं रहेगी,
एक डर सा दिल में उतर आता है।
इस झूठी दुनिया में
तू ही एक सच्ची सी लगती है।
पता नहीं तू मेरी है या नहीं,
पर तुझपे हक़ जताने का मन करता है।
बस यही दिल चाहता है…
कि तू मेरी हो जाए—
पूरी तरह से… सिर्फ़ मेरी।

