तुम्हारा जाना
तुम्हारा जाना
जानता हूँ चली गयी हो तुम
कभी न वापस आने के लिए
उलटी पड़ जाती है सब तरकीबें
जो आजमाता हूं तुमको भुलाने के लिए।
क्यों सोचता हूँ दरवाजा खटखटाकर
कि खोलोगी तुम मुस्कुराकर
क्यों ढूंढती हैं मेरी आँखें तुमको
हार जाता हूँ मैं खुद को मनाकर।
किस सम्त से आ रही है खुशबू तेरी
इसका पता अब हवा भी नहीं देती
हर खटके में ये वहम सा रहता है
कि आ रही हो तुम पायल छनकाती
हर सुबह जगाता हूँ नींद से खुद को
हो तुम कहीं समझाता हूँ दिल को
चिढ़ाती हैं मुझको तारीखें कैलेंडर की फड़फड़ाकर
आता नहीं कोई उस जहाँ में जाकर।
