पुरुष और ईश्वर
पुरुष और ईश्वर
भय हमें विरासत में मिला
नहीं मिली पुरखों की जमीन
फिर उस भय से भयभीत होकर
स्त्री ने चुन लिया पुरुष और ईश्वर
पुरुष जो उसकी रक्षा करे
और ईश्वर जो उसकी गुहार सुने
सदियों की भ्रांति के बाद
अभी अभी उसे मालूम हुआ
कि भय से उपजा प्रेम और श्रद्धा
दोनों ही निरर्थक हैं
तो कोशिश है कि
पुरुष और ईश्वर
दोनों के विकल्प ढूंढे जायें
या भय पर ही जीत हासिल की जाए।
