तुम
तुम
मेरी यादों की अलमारी के
सबसे ऊपरी खाने के
एक कोने में आज भी
वो कागज़ मौजूद हैं
जिसमें वो ख़्याल उकेरा था
जो तुम्हें देखकर पहली दफा
आया था।
मेरी नज़रों ने देखा ही नहीं था
तुम्हें महसूस भी किया था
तुम मेरे "दून" की बारिश हो।
वजह बेवजह आ ही जाती हो
भिगाने मैं पपीहा तो नहीं
जो अब तक प्यासा हूँ।
अपने हाथों की लकीरों से
तुम्हें बाँधू ये क्या मुमकिन
तुम मेरी यमुना की रेत हो।
तोड़ना किनारों को नदियों
का शगूफा हैं दिखना तेरा
फिर गुमशुदा हो जाना
तुम क्या तलाब में
खिलता शगूफा हो।
मेरे सिरहाने एक बगल में
रखता हूँ मैं कलम
जाने कब तू फिर आ जाये।
