STORYMIRROR

Saurabh Bisht

Abstract

4  

Saurabh Bisht

Abstract

तुम

तुम

1 min
383

मेरी यादों की अलमारी के

सबसे ऊपरी खाने के 

एक कोने में आज भी

वो कागज़ मौजूद हैं


जिसमें वो ख़्याल उकेरा था

जो तुम्हें देखकर पहली दफा

आया था।


मेरी नज़रों ने देखा ही नहीं था

तुम्हें महसूस भी किया था

तुम मेरे "दून" की बारिश हो।


वजह बेवजह आ ही जाती हो

भिगाने मैं पपीहा तो नहीं

जो अब तक प्यासा हूँ।

अपने हाथों की लकीरों से

तुम्हें बाँधू ये क्या मुमकिन

तुम मेरी यमुना की रेत हो।


तोड़ना किनारों को नदियों

का शगूफा हैं दिखना तेरा

फिर गुमशुदा हो जाना

तुम क्या तलाब में

खिलता शगूफा हो।


मेरे सिरहाने एक बगल में

रखता हूँ मैं कलम

जाने कब तू फिर आ जाये।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract