एक सूखा वृक्ष
एक सूखा वृक्ष
एक सूखा वृक्ष खड़ा वन में
उपवन में यह शोभा नहीं देगा।
हरे पत्तो से विहीन इसकी देह हैं
यह तो बस कीटों को आश्रय देगा।
एक ठूँठ वैसे भी किस काम का होता हैं
वन में इसलिए धँसा हैं भूमि में
तब तक जब तक कोई गजराज अपने मद में चूर
जड़ से नहीं उखाड़ फेंकता इसे।
इसकी खोह में दीमकों की सभ्यता हैं
सहस्त्रों दीमक जो लकड़ी खाते हैं।
कुछ माह पहले इसकी सूखी डाल में
एक घोंसला था
जिसमें कुछ पक्षी थे लगता हैं
अब उड़ना सीख गए
या शिकार बन गए
दोनों स्थिति में वह ये वृक्ष छोड़ चुके हैं।
इसके आस पास खड़े वृक्ष तरुण हैं
उनकी साख मजबूत और पत्ते हरे हैं।
वो सोचते हैं की इस हरे भरे वन में
यह वृद्ध कृशकाय ठूँठ क्या कर रहा हैं
आखिर किस की आस में उठ बैठा हैं।
वह सूखा वृक्ष कुछ नहीं कहता
न रोता हैं न हँसता हैं न
पवन के साथ झूलता हैं
बसन्त हो या पतझड़ हो
एक समान ही दिखता हैं।
इन सूखे वृक्ष के नीचे हरी हरी दूब हैं
जिसको चखने पशु आते हैं।
इस ठूँठ के सहारे अपनी पीठ खुजाते हैं
चले जाते हैं।
ऐसे ही किसी पशु के खुर में दबा
एक बीज वही धँस गया उस ठूँठ के पास।
फिर सावन आया खूब बरसा
और एक पौधा अंकुरित हुआ।
वो हरा था उसमें पत्ते थे तना नहीं था
उस वृक्ष ने आँखे खोली उसका हाथ पकड़ा
और वो पौधा उससे लिपट गया।
देखते देखते वो इस तरह लिपटा
की वो वृक्ष उसके रंग में रंग गया।
वो आज भी सूखा हैं उसकी खोह में दीमकों
की सभ्यता हैं पशु उस पर आज भी अपनी
पीठ खुजाते हैं।
उसमें फिर एक नया घोंसला बना है
तो फिर क्या बदला है
बस इतना की वो वृक्ष अब हरा हैं।
