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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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तुम वहाँ थे

तुम वहाँ थे

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तुम वहाँ थे

मै यहां था,

और हम ब्यस्त थे

अपने अपने में।

न तुझे मेरा खयाल आया

न मुझे तेरा खयाल आया।


यूं ही अपनी अपनी

ब्यस्तताओं में

एक दिन तुम्हें महसूस हुआ कि

तुम संकट में हो

मुझे भी महसूस हुआ

मै संकट में हूँ।


तुम्हें मेरी याद आयी

मुझे तुम्हारी याद आयी।

तुमने मुझसे मिलने की सोची

मैने तुमसे मिलने की सोची 

और हम मिलने चले तो

वो जो पुल था मिलने का

उसकी जगह दीवार खडी़ है।


कितनी त्रासद है

तुम कह रहे हो

मैनें वो पुल दिया

मैं कह रहा हूं 

तुमने वो पुल तोड़ दिया


आजकल बस‌ इतना ही हो रहा है

और वो जो दीवाल है न पुल की जगह

और मोटी हो रही है

और ऊंची हो रही है।


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