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Mayank Kumar

Abstract

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Mayank Kumar

Abstract

तुम धुंधली हो गई

तुम धुंधली हो गई

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यह जो जिंदगी है

तुम बिन सूनी-सूनी

तुम जो चली गई

किसी सावन सा


मेरे जीवन से

अब मैं क्या करूँ

तुम बिन जी कर

यह जो जिंदगी है

तुम बिन सूनी-सूनी


यह जो एहसास है

मुझको पागल बना देगा

तेरे बिन मुझको

खुद में जला देगा

मैं तारें सा हूं


कब का मर गया हूँ

लेकिन तेरे ख़ातिर

अब भी चमक रहा हूँ

यह जो जिंदगी है

तुम बिन सूनी-सूनी


सच था या सपना था

जब मैं तेरे संग रहा था

कुछ बातें थी रातों की

जहाँ मैंने तुमको जिया था


पर न जाने क्या बात हो गई

तुम ना जाने कब खो गई ?

यादों की परछाई में

धुंधला सा हो गई

यह जो जिंदगी है

तुम बिन सूनी-सूनी।


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