तुम बङे हो गए
तुम बङे हो गए
सच है कि अब तुम बङे हो गए हो
जानते हो मैं यह क्यूँ कहता हूँ
कल तक तुम्हें चला पाने को
साथ साथ सदा थी मेरी अँगुली
पर होता अब शायद समझ के नासमझी
बात पर हर मेरे
बङी रूष्ट हो मेरी नाक में
फट घुस जाती तुम्हारी अँगुली
क्योंकि सच में अब तुम बङे हो गए हो।।
समझ नहीें पाता बिल्कुल कभी
बेमतलब किस बात का वास्ता देेेते हो
सीख मिली जी कर जीवन यह तभी
पच्चीस वर्ष तो तुम्हें सब वही कही
भूलता हूँ कहाँ कभी कि मेहनत मेेेरी सही रही
इस मंजिल तक आए भ्रमित मुझे बताने को
क्योंकि सच में अब तुम बङे हो गए हो।।
छोटा कुुुुनबा,सब बङे भोले और भाले
माता का दिल दिन एक तेेेरे लिए निर्जला
तब अगले दिन नाम हीं पर तेरे जल का एक मीठा प्याला
भगिनी के भैया दूज सा पर्व कौन दूजा
तिलक सजा उन्नत भाल पर तुम्हारे
करती इस दिन वह भगवान भाई की पूूूजा
सब सजाया,माना गलत राह भी चली जो कभी न फली
तुम अरि तमद्दुन का मूूूझे इसी से बना रहे हो
क्योंकि सच मेें अब तुुम बङे हो गए हो।।
दूनिया खत्म नहीं वहाँ जहाँ की सोचते हो तुम
छोङो मेेेरी,सुनो माँ की कही हर वह धुन
बहुत सहा,कभी कुछ न कहा
सब,तुम भी कहते हो वह है बङी भोली
नही जानते जननी ने संतुष्टि से भर दी उसकी झोली
जो ज़र मिला नोंच लिए उसे उसका ही रिश्ता
जान लो हक की अपनी लङाई उसे
उत्तम तरीके से भली भान्ति खूब है आता
पर बिन कुछ कहे निभाए उसने अपने सारे नाता
लगा सीने से तुम्हेें श्रेष्ठता रिश्तों की सिखाई
बात कशमकश की तुम्हारे लिए न हो ग़र
बात सच्ची सबकी कहने में हिचक कयूँ कर
क्योंकि सच मेें अब तुुम बङे हो गए हो।।
जङ से अलग एक वृक्ष की करो तो कल्पना
पत्ता पत्ता शाखा और डाली जो हरी हरी और थीं लाली
सिहर बिखर रह गए बेेेचारे सारे के सारे
टूटा नींव सजा था जिससे उनका हर सपना
सीख यही बस्ती नई बसाओ जोङ ईंट जो दिया हमने
पर न बनाओ कैसा भी कोई तहखाना गुप्त
परामर्श है तुुुुमको हमारा एक बिल्कुल मुुुफ्त
कथन एक सुनो जो कई जन्मों से कही गई
दो पहिए की गाङी हो कोई सी कैसी भी
ग़र रूठा ऐंठा एक तो दूजे की क्या कहनी
सब जानता, पर मत पूछो क्या न सुननी सहनी पङती
सचेत होकर सजगता से विचार करो
मुझसे न कोई विशेष विवाद करो
समझ मिली है समझने का तुम्हेंं साम और भेद
जगो इस अनचाहे नींद से कहीं देर न जाए हो
क्योंकि सच मेें अब तुुम बङे हो गए हो।।
साथी एक साथ सबके हँसी खुशी से आएगा
पर इस वास्ते आठ दस न गंवाया जाएगा
यह सीख तो तुम्हे दी नही कभी हमने
मत करो अपने जमीर को ऐसे बेकार नीलाम
संपति तो नही प्रिय पर कुटुंब अपने
बङे धैर्य जतन यत्न से कमाए हो
व्यर्थ मानव मन तन हो रह जाएगा
इसे संभालने में पिछङ रह गए जो
क्योंकि सच मेें अब तुम बङे हो गए हो।।
मैं पल पल मृत्यु पथ पर अग्रसर हूँ
तुम मुझे कैसे क्या छोङोगे
यह तो बस बस मर्जी है मेरी
अनंत तरफ बढ जाना है अब तो
सोचना है जननी भगिनी की
ऋण से इस मुक्ति को तय करना है
विजयश्री को कर वरण तुुुुम्हें अपनी जय करनी है
साफगोई अपना लो न कुछ छुपा
वर्ना कृत्य उत्तम पर जुल्म अजब गजब सहने हैं
सीख उत्कर्ष की यही,इससे विरत क्यूँ होते हो
क्योंकि सच मेें अब तुुम बङे हो गए हो।।
