तुम और मैं, मैं और तुम...
तुम और मैं, मैं और तुम...
मन मेरा ना जाने
क्यों इस उधेड़बुन में हैं -
क्या गलत-सही
और सही-गलत,
है इसमें फर्क कोई ?
अपना-पराया,
पराया-अपना भी है कोई ?
साथ-मेरे और
मेरे-साथ भी है कोई ?
मेरा-नसीब और
नसीब-मेरा भी है कहीं ?
मुझमें-सब और
सब-मुझमें ही हैं कहीं ?
जमीन-आकाश,
आकाश-जमीन ही है यहीं ?
रात-दिन,
दिन रात ही तो नहीं ?
कहीं-में और
में-कहीं कोई फर्क तो नहीं ?
