STORYMIRROR

Prabhakar Kathayat

Drama

2  

Prabhakar Kathayat

Drama

तुम और मैं, मैं और तुम...

तुम और मैं, मैं और तुम...

1 min
14.6K


मन मेरा ना जाने

क्यों इस उधेड़बुन में हैं -


क्या गलत-सही

और सही-गलत,

है इसमें फर्क कोई ?


अपना-पराया,

पराया-अपना भी है कोई ?

साथ-मेरे और

मेरे-साथ भी है कोई ?

मेरा-नसीब और

नसीब-मेरा भी है कहीं ?


मुझमें-सब और

सब-मुझमें ही हैं कहीं ?

जमीन-आकाश,

आकाश-जमीन ही है यहीं ?


रात-दिन,

दिन रात ही तो नहीं ?

कहीं-में और

में-कहीं कोई फर्क तो नहीं ?


Rate this content
Log in

More hindi poem from Prabhakar Kathayat

Similar hindi poem from Drama