टूटता तारा...
टूटता तारा...
मेरी आमदनी है अठन्नी और
खर्च होता है रूपया...
अरे, ओ विधाता ! ज़रा अब तो
पार लगा मेरी डूबती नैया...
पार लगा मेरी डूबती नैया...
पार लगा मेरी डूबती नैया...
ख़्वाब तो देखें हैं मैंने बहुतेरे,
मगर पूरा होता बहुत कम ही
नज़र आता है मुझे...
यही है दास्तान-ए-ज़िन्दगी मेरी,
अरे, ओ विधाता ! अब तो
मिला दे मुझे आसमानी ख्वाबों के
आशियाने से...
ज़रा मैं भी तो चलता हूँ
अपनी कामयाबी का परचम लहराते हुए
दूर गगन की छांव में...
दूर गगन की छांव में...
दूर गगन की छांव में...
