टूटा हुआ पहाड़
टूटा हुआ पहाड़
कामनाओं का टूटा हुआ पहाड़
और शेष मुस्कराती हुई उम्मीद
अपनी एक कामना में ही
मनुष्य हूँ, तो और क्या चाहिए
मनुष्य सा दिखना और
मनुष्य सा होना
कितनी दूरी होती है,
दिखने में और होने में
सदियों का फासला है
और कभी कभी
लगता है ये फासला
एक पल में तय हो सकता है,
बार बार तय भी हुआ है
हमने आदमी के भेष में
अपने ईश्वर को देखा है
और दुनिया कहती है
ईश्वर अजन्मा है
और हमने उसे माँ के
साए में पलते हुये देखा है
मनुष्य बनने की कामना
साकार होने में
खुद ही अकेली है वो
यकीन है उसका
मनुष्य बचेगा
तो उसकी सृष्टि बचेगी।
